Sunday, April 23, 2017

ये मुख्यमंत्री नहीं, शिवराज के भीतर के कार्यकर्ता की आवाज़

शिवराज सिंह चौहान. काम ज्यादा, बोल कम. चेतावनी, धमकी,नसीहत. ये शब्द शिवराज के शब्दकोश में नहीं हैं. पर मोहनखेड़ा से कुछ अलग निकला. यहाँ मुख्यमंत्री ने अपने सुर बदले. बदलाव भी एक दम यू टर्न जैसा. बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में शिवराज ने चेतावनी दी. वो भी अपने मंत्रियों को. सीधे-सीधे वे बोले-जो मंत्री संगठन की बैठक में नहीं आ सकते, वे इस्तीफा दे दें. अफसरों तक को कभी चेतावनी न देने वाले का ये अंदाज़ बड़ा सन्देश है. इसके दो मायने हैं. पहला-संगठन को सत्ता से उपर स्थापित करना. दूसरा-मंत्रियों और बड़े नेताओं को चुनाव के पहले उनकी जमीन दिखाना. दरअसल बीजेपी की सत्ता तो मजबूत हुई, पर संगठन लगातार कमजोर हो रहा है. पूरे प्रदेश में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मामला उठता रहा है. बीजेपी पिछले चौदह साल से सत्ता में है. इन चौदह सालों में साल दर साल कार्यकर्ता कमजोर होता गया. पार्टी कुछ छत्रपों में बंट कर रह गई. बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो रहा है. कांग्रेसीकरण यानी सत्ता और संगठन में दूरी. कांग्रेस के मंत्रियों में भी गुरुरु था कि वे अपने दम पर हैं,वे और उनके आसपास की "जी हुजूर" मंडली ही संगठन है. बीजेपी पर चूंकि संघ का सेंसर लगा हुआ हैइसलिए कोई मंडली उसपर कब्ज़ा नहीं कर पाई. फिर शिवराज को ऐसा क्यों कहना पड़ा? साफ है, मोहनखेड़ा में कई बड़े नेता और मंत्री नहीं पहुंचे. जो पहुंचे वे भी पूरे दो दिन नहीं रुके. कुछ तो सिर्फ मुँहदिखाई की रस्म करके लौट गए. इसमें से तीन चार तो ऐसे हैं जो सिर्फ कुछ घंटे के लिए आये. किसी भी मंत्री, बड़े नेता के पास संगठन के लिए 48 घंटे की फुर्सत नहीं हो इसे क्या कहा जाएगा. वाकई मंत्रियों और बड़े नेताओं का ये रवैया खतरे की घंटी है. शिवराज चूंकि संगठन की तगड़ी समझ वाले नेता है, उनमे मुख्यमंत्री होने के बावजूद बीजेपी का कार्यकर्ता वाला भाव जिन्दा है. इसीलिए वे इस खतरे घंटी की आवाज़ सुन सके. शिवराज ने ये तक कहा कि जब राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में पूरे समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मौजूद रह सकते हैं, तो आप लोग क्यों नहीं. मोहनखेड़ा में "शिवराज बोलते नहीं" की आम धारणा टूटी. मोहनखेड़ा बीजेपी की संगठन की राजनीति में बदलाव की शुरवात साबित होगा.

Thursday, April 13, 2017

अंबेडकर के प्रति पूर्वाग्रह रखते थे गांधी, दोनों की पहली मुलाकात भी थी बेहद तल्ख!

14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती है। इंदौर के पास महू बाबा साहेब की जन्मभूमि है। यहां कई आयोजन होंगे। महात्मा गांधी और अंबेडकर दोनों ही छुआछूत के खिलाफ अभियान चला रहे थे। अंतर सिर्फ इतना था कि गांधी सवर्ण थे, और अंबेडकर दलित समुदाय से। दोनों में कई समानता भी रही, जैसे विदेश में पढाई, कानून के जानकार, दोनों का लक्ष्य आम आदमी तक पहुंचना। अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज बुलंद करना। इतनी समानता के बाद भी महात्मा गांधी और बाबा साहेब अंबेडकर के बीच रिश्ते बेहद तल्ख़ रूप में जाने जाते हैं। बहुत सारे लेख, किताबें और इतिहासकार भी यही दर्शाते हैं कि गांधी और बाबा साहेब की पटरी नहीं बैठती थी। दोनों के बीच पहली मुलाकात भी बेहद तल्ख रही। हालांकि वक्त के साथ रिश्तों में सुधार हुआ। पर दोनों के बीच कभी बेहद निकटता या भावनात्मकता वाले प्रमाण नहीं मिलते। तमाम साहित्यकारों ने ये बताने की कोशिश की है कि दोनों एक दूसरे के निकट थे। ये बहुत हद तक गले नहीं उतरता। गांधी ने अपने जीवनकाल में बहुत कुछ लिखा। उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस यहां तक की जिन्ना के बारे में भी विस्तार से कई जगह जिक्र किया है, पर बाबा साहेब को लेकर ऐसा कुछ गांधी ने नहीं लिखा. क्यों? शायद गांधी अपने प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखते थे बाबा साहेब को. संभव है, गांधी के मन में ये भाव रहा हो कि ये युवक कैसे दलितों के खासकर छुआछूत के मुद्दे को इतनी बेबाकी से उठा सकता है। इसका कारण, गांधी अस्पृश्यता को पूरी तरह अपना मौलिक विचार मानते रहे होंगे। एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है है कि गांधी को बाबा साहेब पर भरोसा न रहा हो। बाबा साहेब की विदेशों से ली गई डिग्री और सूट-बूट वाली छवि गांधी को ये मानने से रोकती होगी कि एक विदेशी विचार वाला व्यक्ति कैसे दलितों के मुद्दे पर लड़ाई लड़ सकेगा। महात्मा और बाबा साहेब के बीच करीब 20 सालों के सम्बन्ध रहे, सार्वजनिक रूप से सीधे-सीधे दोनों के बीच के मतभेद सामने आते रहे। कुछ राजनीति शास्त्रियों का मानना है कि दोनों की बीच मतभेद रहे पर मनभेद नहीं रहा, पर रिश्ते बहुत भावनात्मक भी नहीं रहे। दरअसल तमाम अध्ययन का सार ये निकलता है कि गांधी अंबेडकर को लेकर पूर्वाग्रह से भरे हुए थे। गांधी के मन में ये बात गहरे बैठी हुई थी कि अंबेडकर ने विदेश से डिग्री हासिल की है। वे अंबेडकर को सूट-बूट वाला एक यूरोपियन स्टाइल का युवा मानते थे। उन्हें लगता था कि अंबेडकर एक उतावले सवर्ण समुदाय के युवा हैं, जो बदलाव के लिए बेताब है। गांधी संभवतः दो बातों को लेकर भ्र्म के शिकार हुए। पहला-उन्हें लम्बे समय तक ये भ्रम रहा कि अंबेडकर सवर्ण समुदाय से हैं। दूसरा उन्हें लगता था कि अंबेडकर विदेशी नजरिए से हिंदुस्तान देख रहे हैं, उन्हें देश की जयादा जानकारी नहीं है। ये दो कारण ही गांधी के अंबेडकर के प्रति पूर्वाग्रह के कारण बने। यही कारन रहा कि सरल और सहज व्यवहार वाले गांधी ने पहली मुलाकात में बाबा साहेब से बड़े तीखे अंदाज़ में और लगभग उनके विचार को अस्वीकार करते हुए बात की। गांधी ने अंबेडकर को यहां तक कह दिया था कि-डॉक्टर आप पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं अछूत आंदोलन से जुड़ा हूं। डॉक्टर कहकर भी गाँधी ने एक तरह से अंबेडकर पर तंज़ ही कसा था। 14 अगस्त, 1931 को दोनों की पहली मुलाक़ात बंबई के मणि भवन में हुई, गांधी मुंह से पहला ही वाक्य निकला- ह्यतो डॉक्टर, आपको इस बारे में क्या कहना है? महात्मा गांधी जैसे अनुभवी और उम्रदराज व्यक्ति के तीखे तंज का अंबेडकर जैसे युवा का जवाब भी तंज के साथ ही था- आपने यहां मुझे आपकी अपनी बात सुनने के लिए बुलाया था। कृपा करके वह कहिए जो आपको कहना है। या आप चाहें तो मुझसे कोई सवाल पूछें और फिर मै जवाब दूंगा। गांधी का स्वर भी तीखा हो गया, वे बोले- मैं समझता हूं कि आपको मेरे और कांग्रेस के खिलाफ कुछ शिकायते हैं। आपको बताऊं कि अपने स्कूल के दिनों से ही मैं अस्पृश्यों की समस्या बारे में सोचता रहा हूं। तब तो आपका जन्म भी नहीं हुआ था। यह आश्चर्य की बात है कि आप जैसे लोग मेरा और कांग्रेस का विरोध करते हैं। यदि आपको अपने रुख को साबित करने के लिए कुछ कहना है तो खुलकर कहिए। जवाब में डॉ अंबेडकर की बातों में भी व्यंग्य था। उन्होंने कहा- महात्माजी, यह सच है कि जब आपने अछूतों की समस्या के बारे में सोचना शुरू किया तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। सभी बूढ़े और बुजुर्ग लोग हमेशा अपनी उम्र की दुहाई देते हैं। यह भी सत्य है कि आपके कारण ही कांग्रेस ने इस समस्या को मान्यता दी। लेकिन मैं आपसे कहूंगा कि कांग्रेस ने इस समस्या को औपचारिक मान्यता देने के अलावा कुछ भी नहीं किया. आप कहते हैं कि कांग्रेस ने अछूतों के उत्थान पर बीस लाख रुपये खर्च किए। मैं कहता हूं कि ये सब बेकार गए। इतने सबसे तो मैं अपने लोगों के विचारों में में आश्चर्यजनक परिवर्तन ला सकता था। लेकिन इसके लिए आपको मुझसे बहुत पहले मिलना चाहिए था। देश को आज़ादी दिलाने वाले और देश को संविधान देने वाले हिंदुस्तान के दो नेताओं की मुलाकात पर अभी और गंभीर शोध की जरुरत है। निश्चित रूप से गाँधी और अंबेडकर के रिश्तों की पड़ताल देश में सवर्ण और दलित रिश्तों पर नये ढंग से रोशनी डालेगा।