Wednesday, January 25, 2017
आखिर औरतों को सिर्फ "फेयर एंड लवली" बताकर अपनी बदसूरती क्यों दिखाते हैं नेता !
आखिर औरतों को सिर्फ "फेयर एंड लवली" बताकर
अपनी बदसूरती क्यों दिखाते हैं नेता !
पंकज मुकाती
हमेशा से औरतों को राजनीति में कमतर आंकते रहें हैं, मर्द नेता. आखिर औरतों के सियासत में उतरने से इन नेताओं में इतनी घबराहट क्यों? क्यों इतने बेचैन हो जाते हैं हमारे नेता किसी भी औरत के राजनीति में सक्रिय होने पर. ऐसा क्या है जो इन मर्दों की मर्दानगी को आहत कर देता है. आखिर क्यों ये महिलाओं को बस खूबसूरती और चेहरे की नुमाइश तक ही सीमित रखना चाहते हैं. संसद से लेकर सड़क तक सिर्फ महिलाओं पर फेयर एंड लवली बयान देकर ये क्या साबित करने की कोशिश करते हैं. क्या ये खुद के खूबसूरत ना होने की इनकी कुंठा और ईर्ष्या है, जो ये महिलाओं की खूबसूरती को लेकर बयान देकर खुद को दिमागी तौर पर काबिल बताने की कोशिश करते हैं. पर हकीकत में ये सारे मर्द ऐसे बयान देकर महिलाओं के नहीं अपनी ही मानसिक बदसूरती को उजागर करते हैं. ताज़ा मामला जनता दल यू के शरद यादव का है. यादव का कहना है कि बेटी की इज्जत से ज्यादा बड़ी है वोट की इज्जत. यहाँ तक तो ठीक है, पर शरद ऋतू की तरह हमेशा मदमस्त रहने वाले राजनीति के इस शरद ने सारी सीमायें तोड़ दी. बोले-बेटी की इज्जत जाए तो सिर्फ मोहल्ले और गांव में बदनामी होती है. जबकि वोट लूट जाये तो देश बदनाम होता है. औरतों की इज्जत को लेकर उनका ये पहला और बहुत हद तक आखिरी बयान भी नहीं होगा. औरतों की खूबसूरती पर उनके बदसूरत बोल हमेशा आते रहे हैं. बीजेपी नेता विनय कटियार ने भी प्रियंका गांधी पर ऐसे ही बचकाना बयान दिया. खुद को धर्मयुध्द के वीर और हिंदूवादी राजनीति का सबसे बड़ा नेता साबित करने में लगे रहने वाले कटियार का कहना है प्रियंका क्या है उनसे खूबसूरत कई महिलायें स्टार प्रचारक हैं. कांग्रेस महासचिव और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी एक बार अपनी ही पार्टी की नेता मीनाक्षी नटराजन को सौ टंच माल बता चुके हैं.आखिर ये भाषा क्यों ? एक तरफ महिलाओं, लड़कियों को बराबरी के हक़ की घोषणाएं, उन्हें मुफ्त शिक्षा, आरक्षण जैसी तमाम योजनायें अपने मूँह से बयान करके अपनी छाती ठोंकने वाले नेता, इन्ही आगे बढ़ती महिलाओं को देखकर छाती पीटने क्यों लगते हैं ? कथनी और करनी का ये विरोधाभास सिर्फ राजनीति में ही नहीं है, पर राजनीति में महिलाओं का रास्ता सबसे ज्यादा रोका जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा तो उन्हें अपनी ही पार्टी में सफाई देनी पड़ी. क्यों? क्या किसी महिला को अच्छे काम पर दुर्गा कहना अपराध है, जबकि वही धर्मपंथी, हिंदूवादी लोग देवी दुर्गा के नाम से अपनी शाखायें लगाते है, दुर्गा वाहिनी बनाते हैं. ये कोई एक दल या एक नेता की बीमारी नहीं है. शरद यादव ने तो संसद में भी अपना रवैया वही रखा. एक सांसद को लेकर वे बोले दक्षिण भारत की महिलाएं सांवली तो ज़रूर होती हैं, लेकिन उनका शरीर खूबसूरत होता है, उनकी त्वचा सुंदर होती है, वे नाचना भी जानती हैं. लेकिन भारत के लोग गोरी चमड़ी के आगे सरेंडर कर देते हैं. यहां तो सफेद रंगत देखकर लोग दंग रह जाते हैं। शादी के विज्ञापनों में भी लिखा रहता है, गोरी लड़की चाहिए, ये सब कहते हुए उनकी भाव भंगिमा ही उनके पूरे स्वरुप को बता रही थी. शरद यादव ने संसद में महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि यदि ये बिल पारित हो गया तो मैं ज़हर खा लूंगा. शरद यादव ने ये भी कहा था कि इस बिल से सिर्फ़ पर कटी औरतों को फ़ायदा पहुंचेगा. स्मृति ईरानी पर वे बोले थे आप चुप रहिये- मैं जानता हूँ आप क्या हैं. इस देश ने इंदिरा गांधी, जयललिता, ममता बनर्जी, सुषमा स्वराज, चन्दा कोचर, इंदिरा नुई, बछेंद्री पाल, कल्पना चावला, जैसी मजबूत औरतों को देखा हैं. जिन्होंने मर्दों के सामने अपनी ताकत, बुद्धि का लौहा मनवाया. आखिर ये फेयर एंड लवली वाले बयानों से और जिस्म से अलग औरतों को दिमागी रूप से कब देखेंगे हमारे नेता. ऐसे ही बेतुकी बयानों के कुछ नमूने -
दिग्विजय सिहं, कांग्रेस नेता
मुझे पता है कि कौन फर्जी है. और कौन सही है. इस क्षेत्र की सांसद मिनाक्षी नटराजन सौ टंच माल है.
श्रीप्रकाश जायसवाल, कांग्रेस नेता
नई शादी का मजा ही कुछ और होता है और ये सब जानते हैं कि पुरानी बीवी मे वो मजा नहीं रहता
आजमखान,नेता समजावादी पार्टी
शाहजहां ने ताजमहल बनवाया और मायावती ने अपनी मुर्तियां लगवाई. शाहजाहां को उनके बेटे औरंगजेब ने कैद किया था. ऐसे ही मायावती को जल्दी ही कोई औरंगजेब कैद करेगा.
अभिजित मुखर्जी,नेता कांग्रेस
हर मुद्दे पर कैंडल मार्च करने का फैशन हो गया है.लड़कियां दिन में सज-धज कर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं.
कैलाश विजयवर्गिय,नेता बीजेपी
क्योंकि महिलाओं को ऐसा श्रृंगार करना चाहिए कि देखने वाले को महिला के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो. दुर्भाग्य से कभी-कभी ड्रेसअप महिलाओं का ऐसा होता है कि उत्तेजना आ जाती है और निश्चित रूप से कई बार यह भी देखने को मिलता है कि इसके कारण भी समाज के अंदर विकृति आती है
लालू प्रसाद यादव,आरजेडी
"हम बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों जितना मुलायम बना देंगे."
मख्तार अब्बास नक़वी,बीजेपी
महिलाएं लिपस्टिक और पॉवडर लगाकर हाथ में मोमबत्ती लिए पश्चिमी सभ्यता के साथ नेताओं को गाली देती हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा अलगाववादी करते हैं।
नरेन्द्र मोदी,प्रधानमंत्री
हिमाचल की चुनवी सभा में शशि थरुर की पत्नि सुनंदा पुष्कर की के बारे में कहा थी कि 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड
संजय निरुपम,नेता कांग्रेस
स्मृति ईरानी कल तक टीवी पर ठुमके लगाती थी आज चुनाव विश्लेषक बन गई हैं
Tuesday, January 17, 2017
शिवपाल यादव का हश्र, चेतावनी है तानाशाही की राजनीति करने वाले नेताओं को !
कल तक "पार्टी" मांग रहे चाचा शिवपाल आज
अपने खुद के टिकट के लायक भी नहीं रहे क्यों ?
कहावत है कि किस्मत कब बदल जाये कहा नहीं जा सकता. राजनीति में तो कई बार कुछ घंटों में ही बाज़ी पलट जाती है. राजा रंक और रंक राजा बन जाता है. उत्तरप्रदेश में कल तक समाजवादी पार्टी के मुखिया रहे चाचा शिवपाल से ज्यादा इसे कौन समझ सकेगा. दो दिन पहले तक पूरी समाजवादी पार्टी पर अपना दावा जताने वाले शिवपाल आज अपने खुद के टिकट के लिए अखिलेश के भरोसे हैं. पिछले सप्ताह तक समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रमुख बनकर पूरी 403 सीटों पर अपनी मर्जी से टिकट बांटने का अधिकार और जिद रखने वाले शिवपाल आज नितांत अकेले हैं. राजनीति में वैसे भी कोई कभी किसी का सगा नहीं। समाजवादी पार्टी में तो बेटा अपने पिता का ना हुआ. पिता से टक्कर लेने वाला चाचा को कैसे बक्श देगा? शिवपाल ने टिकट के लिए अपनी सूचि भी जारी कर दी थी और इसी सूची ने उन्हें समाजवादी पार्टी की सूची से ही बाहर कर दिया. सत्ता के साथी होते हैं, कार्यकर्त्ता, नेता और मंत्री। यदि पार्टी की लड़ाई मुलायम जीत जाते तो आज शिवपाल के घर हजारों लोगों का हुजूम होता. पर आज सबकुछ अखिलेश के पाले में हैं. वक्त रहते राजनीति की करवट को न समझना, बदलाव की इबारत को न पढ़ पाना, अपने पुराने दौर की ज़िद, घमंड और "मैं" की गुंडई शिवपाल को भारी पड़ी. ये भी सिद्ध हो गया कि शिवपाल की अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है. वे सिर्फ मुलायम सिंह यादव के आशीर्वाद और यादव कुनबे के होने के सत्ता और संगठन सुख लेते रहे. आखिर क्यों चूक गए शिवपाल जैसे चालाक राजनेता. सीधा कारण है, जनता और कार्यकर्त्ता अब धमकाने वाले, रंगदार जैसा व्यवहार करने वाले नेता को पसंद नहीं करती. जनता ही नहीं कार्यकर्त्ता भी अब बराबरी का हक़, साथ खड़े होने का सम्मान चाहता है, वो किसी के चरणों में धमक के कारण झुकने को तैयार नहीं है. अखिलेश ने उत्तरप्रदेश खासकर समाजवादी पार्टी की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा किया है. उन्होंने अपनी सूरत की तरह ही अपनी सीरत से भी लोगों में ये भरोसा पैदा किया कि यादव कुनबे का ये सपूत थोड़ा अलग है. समाजवादी पार्टी की लड़ाई, कुनबे का संघर्ष चाहे जो परिणाम दे चुनाव में, पर एक बात तय है देश में युवा शक्ति, युवा राजनीति और लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है. न कोई पार्टी किसी की खानदानी विरासत हो सकती है, न कोई कार्यकर्त्ता और जनता का अपमान करके लंबी पारी खेल सकता है. अब सम्मान और विकास की राजनीति का ही दौर है. गुमान, जिद, तानाशाही अब बीते दिनों की बात हुई.
Tuesday, January 10, 2017
राहुल करवायेंगे मोदी से शीर्षासन !
जनवेदना कार्यक्रम में राहुल गांधी ने जिस तरह से नरेंद्र मोदी पर हमला बोला वो राहुल के बदलाव को बताता है. दरअसल नोटबंदी के बाद से विपक्ष और खासकर राहुल गाँधी बहुत मुखर हुए हैं. वे लगातार मोदी पर हमला बोल रहे हैं. जनवेदना के जरिये भी वे एक तरीके से मोदी की नीतियों से जनता को हुई वेदना और दर्द को ही सामने रख रहे हैं. राहुल गाँधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने पद्मासन सीखा नहीं और करने लगे योग. अब गलत तरीके से योग करेंगे तो हड्डी टूटेगी ही. ये राहुल गांधी का अब तक का मोदी पर सबसे बड़ा और गंभीर हमला है. जाहिर है राहुल यह कहना चाह रहे है, की नोटबंदी के नफे, नुकसान का आकलन किये बिना मोदी ने इसे लागू कर दिया. मोदी के इस बिना पद्मासन के नोटबंदी योगा ने देश की रीढ़ तोड़ दी. उन्होंने यहाँ तक कहा कि नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत किसी की नहीं सुन रहे बस अपनी मनमानी से फैसले कर रहे हैं. मोदीजी ने अपने मर्जी के होम मेड इकोनॉमिस्ट भी तैयार कर लिए है. राहुल बोले बाबा रामदेव और संघ के लोग जब इकोनॉमिस्ट होंगे तो सोचिये क्या होगा देश की अर्थव्यवस्था का. राहुल ने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि एक अंग्रेजी अखबार के कार्यकम् में मुझे दुनिया को नोटबंदी का आईडिया देने वाला इकोनॉमिस्ट मिले और बोले मैंने मोदी को नोटबंदी जिस तरह से करने को कहा था वैसा तो उन्होंने किया ही नहीं. नोटबंदी से परेशान देश, एकजुट होता विपक्ष और राहुल गाँधी के धारदार होते हमले मोदी को बैकफुट पर ला सकते हैं. वैसे भी जनता को नोटबंदी के पहले जितना कालाधन को लेकर मोदी पर भरोसा था वो अब नहीं दिखता। जनता ये मानती थी की मोदी कालाधन बाहर लाएंगे. गरीबों को भला होगा पर ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा. राजनीतिक दलों को बेहिसाब धन जमा करवाने की छूट और बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ़ी ने जनता की वेदना को बढांया है. अब नोटबंदी कालाधन बाहर लाने
और अच्छे दिन के बजाय सिर्फ कैशलेस इकोनॉमी अभियान बनकर रह गया है. राहुल का ये आक्रमण कहीं भविष्य में मोदी को " शीर्षासन" न करवा दे.
और अच्छे दिन के बजाय सिर्फ कैशलेस इकोनॉमी अभियान बनकर रह गया है. राहुल का ये आक्रमण कहीं भविष्य में मोदी को " शीर्षासन" न करवा दे.
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