Saturday, June 24, 2017

मौत में स्वार्थ तलाशते डॉक्टर और नेता

प्रदेश का सबसे बड़ा इंदौर का एमवाय अस्पताल तीन दिन से चर्चा में है। मरीजों की मौत का सच, उसके कारण और लापरवाही अभी तय होना बाकी है। सभी संदेह के घेरे में हैं। मरीजों की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, पर उस मौत से लाभ उठाने की कोशिश शर्मनाक है। लोगों की जिंदगियां बनाने, बचाने का जिम्मा यदि किसी के पास है तो वो हैं-डॉक्टर और नेता। एक जीवन बचाने की और दूसरा समाज गढ़ने की शपथ लेता है। एमवाय हॉस्पिटल की घटना में दोनों ने अपना सम्मान खो दिया। 17 मरीजों की मौत को अपनी रंजिश, निजी ईर्ष्या का बदला लेने के लिए इस्तेमाल किया वरिष्ठ चिकित्सक रामगुलाम राजदान ने। राजदान ने मीडिया के एक वर्ग को प्रभाव में लेकर आॅक्सीजन की कमी से मौत की अफवाह फैलाई। उन्होंने बड़े शातिराना तरीके से ये स्थापित किया कि 24 घंटे में 17 मौत हो गई, जबकि राजदान खुद अच्छे से जानते हैं कि एमवाय हॉस्पिटल में रोज इतनी मौत सामान्य हैं। राजदान सस्पेंड कर दिए गए। ये प्रशासनिक प्रक्रिया है। संभव है, कुछ दिनों में राजदान बहाल भी हो जाएं। पर राजदान के जुर्म ने मरीजों और उनके करीबियों के दिमाग में जो अविश्वास और डर पैदा किया है, उसे कोई भी निलंबन और बर्खास्तगी नहीं भर सकेगी। दूर दराज से सैकड़ों लोग रोज इलाज के लिए इंदौर आते हैं, उम्मीद के साथ। राजदान जैसे लोग उन उम्मीदों को कमजोर कर देते हैं। लोगों में एक डर पैदा होता है कि एमवाय जाएंगे तो पता नहीं बचेंगे या नहीं। ये वो अस्पताल है, जहां तमाम कमियों के बावजूद सबसे मुश्किल आॅपरेशन होते हैं। तमाम चकाचौंध वाले फाइव स्टार हॉस्पिटल भी जिन मरीजों का इलाज करने में नाकाम रहते हैं, उसे कामयाब बनाते हैं बड़े अस्पताल के डॉक्टर। रात-दिन ईमानदारी से काम करने वाले डॉक्टर्स, नर्सें, सफाईकर्मी और इसे सुपरस्पैशिएलिटी का दर्जा दिलवाने के लिए संघर्ष करने वाले अफसरों की भी बदनामी ऐसे ‘गुलाम’ विचारों के कारण होती है।
अब, आते हैं राजनीति पर। कांग्रेस ने शुक्रवार को जो किया वो उसके पतन को सही साबित करता है। जिस ढंग से कांग्रेस के नेताओं ने एक मृतक के बेटे को घर से उठाकर प्रदर्शन में खड़ा कर लिया वो किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता। गलत का विरोध जरूरी है, सही बात सामने लाना आपका हक है, पर सच की खोज में ऐसा संवेदनाहीन, विचारविहीन प्रदर्शन? तस्वीरों में देखिए, एक मौत की आड़ में पूरी पार्टी खड़ी दिखाई दे रही है। कैसे मुआवजा दिलवाने का लालच देकर एक बेटे को अपनी घिनौनी राजनीति का चेहरा बनाया जा सकता है? क्या कांग्रेस में अपनी खुद की इतनी भी ताकत और नैतिकता नहीं बची कि वो अपनी आवाज रख सके। क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को इतनी तमीज भी नहीं रही कि कब क्या करना है। उन्हें इस बात की भी शर्म नहीं कि जब सच सामने आएगा तो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे। कांग्रेस की झूठ की आभा कुछ घंटों में ही बुझ गई, जब मृतक के बेटे ने कहा कि आॅक्सीजन की कमी की कोई बात उसने नहीं कही, उसे तो मुआवजा दिलवाने का कहकर ले जाया गया था। आखिर कब ऐसी मानसिकता का इलाज होगा?

Sunday, June 11, 2017

आखिर क्या हासिल हुआ ?

शनिवार को किसान आंदोलन (जायज मांग, नाजायज हिंसा, प्रताड़ना, मनमानी) का दसवां दिन बीता। किसानों का ये आंदोलन शुरू शहर का दाना-पानी बंद करने से हुआ। दो दिन की शांति के बाद इसमें राजनीति और उपद्रवी घुस गए। बस, यहीं से आंदोलन बिखर गया। कारण, इसके पीछे अपने हक की लड़ाई से ज्यादा उत्पात था। दरअसल आंदोलन करने वालों की मिट्टी अलग होती है। वे थकते नहीं, अनवरत अपने काम में लगे रहते हैं। उपद्रवी तो वक्ती होते हैं। क्या हिंसा, बसें फूंक देना, यातायात रोकना, लोगों को दूध, सब्जी के लिए तरसा देना किसी नतीजे पर ले जाएगा। थोड़ा पलटकर देखेंगे तो हम पाएंगे मात्र दस दिनों में हमने क्या-क्या खो दिया। सबसे पहले आर्थिक पहलू, प्रदेश की मंडियों और उससे जुड़े धंधों में कुल मिलाकर एक हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान प्रदेश ने झेला। इससे किसकी जेब कटी। निश्चित ही किसान की। आखिर किसानों ने ये कैसा आंदोलन चलाया जिसमें नुकसान भी उनका ही हुआ। इतने बड़े कारोबार का फायदा भी मिलता तो किसानों के परिवारों को ही। आखिर किस पर दबाव बनाया आपने। सरकार या अफसरों तक अपनी मांगे सही ढंग से पहुंचाने में आंदोलन विफल रहा। कारण, दूसरे ही दिन इसकी दिशा भटक गई। पूरी सरकारी मशीनरी और सरकार का ध्यान हिंसा से निपटने में लग गया, किसानों की मांगों पर नहीं। दूसरा, शहरों का दाना-पानी रोककर किसान जनता के बीच खलनायक बन गए।
मुख्यमंत्री के भोपाल के दशहरा मैदान में उपवास के पीछे भी किसानों के आंदोलन का दबाव नहीं, बल्कि हिंसा रोकने की कोशिश ज्यादा है। वे व्यथित दिखे। शिवराज ने साफ कहा, किसानों के साथ खड़ा हूं, मांगे भी मानूंगा। पर जनता की परेशानी की कीमत पर नहीं। राजधर्म निभाते हुए जनता की सुरक्षा भी करूंगा। हालांकि ये गौर करने वाली बात है कि मुख्यमंत्री के उपवास पर बैठने वाले दिन प्रदेश में कहीं कोई हिंसा नहीं हुई। शिवराज के उपवास के साथ ही प्रदेश की शांति ने ये भी साबित किया कि शिवराज जननेता हैं। लोगों को उनकी बात पर अब भी भरोसा है। शिवराज दरअसल वो चेहरा हैं जो गांव और शहर को जोड़ता है। जितना शहरी लोग उन्हें अपना मानते हैं, उतना ही किसान और ग्रामीण भी उन पर हक जताते हैं। पर इस आंदोलन ने शहर और गांव के इस जुड़ाव को भी तोड़ा है। दस दिनों में शहरों और गांवों के बीच एक दरार सी खिंच गई। ये आज भले न दिख रही हो, पर आगे के लिए खतरा है। आखिर किसका दाना-पानी रोका आपने? कभी सोचा? इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर जैसे शहरों में बड़ी संख्या में गांवों से आकर ही लोग रहते हैं।आपके बेटे-बेटी शहरों में आकर पढ़ते हैं। आपकी बेटी की ससुराल भी शहर में हो सकती है, आपके नाती-पोते भी दूध को तरसे होंगे। आखिर जनता का दूध, सब्जी बंद करने से क्या मिला?से महिलाओं और बच्चों को उतारकर उन्हें खेतों में दौड़ाना क्या सही तरीका है। क्या इन बसों में किसानों के परिवार नहीं थे? क्या अब हमें जातिवाद, क्षेत्रवाद के बाद शहरी और ग्रामीण संघर्ष का भी सामना करना पड़ेगा? ये आंदोलन किसान ही नहीं सरकार के लिए भी सबक है। दोनों, सोचें आखिर हासिल क्या हुआ ?

Thursday, June 8, 2017

‘ब्रांड’ शिवराज अब भी विश्वसनीय, बशर्ते...

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सदमे में हैं। उनकी खामोशी इसका सबूत है। शिवराज सिंह इन दिनों दिखाई नहीं दे रहे हैं। जबकि हमेशा गायब रहने वाले राहुल गांधी मैदान में हैं। वे बोल भी रहे हैं। प्रदेश में किसानों पर फायरिंग और छह मौत का असर राजनीति पर साफ है। राहुल का दिखना और मुखर होना कितना असर करेगा। ये वक्त तय करेगा। पर शिवराज की खमोशी बड़ा नकारात्मक असर करेगी। शिवराज एक ऐसे शख्स हैं, जो काम में भरोसा रखते हैं। इस वक्त भी वे सक्रिय हैं, होंगे। पर राजनीति में सक्रिय होने के साथ सक्रिय दिखना भी जरूरी है। जनता में विश्वास तभी लौटता है जब नेता सीधे सामने आता है। लोग उनका पक्ष सुनना चाहते हैं। वो भी सीधा। बिना लागलपेट उन्हें स्वीकारना चाहिए प्रशासन की गलती है, मैं इस चूक की जिम्मेदारी लेता हूं। पर इस वक्त उनके मंत्री और अफसर बोल रहे हैं। जो ठीक नहीं है। गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह और महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने पहले ही दिन ये कहकर किसानों का गुस्सा बढ़ा दिया कि पुलिस की गोली से नहीं मरे किसान। अफसर भी ऐसा ही गोलमोल करते रहे। बेहतर होता शिवराज खुद आकर ये जवाब देते। शिवराज के प्रति जो भरोसा जनता में है पिछले तीस साल में किसी नेता के प्रति नहीं रहा। महिलाओं, बेटियों व किसानों के भी बड़े वर्ग के बीच अभी भी वे चमकता चेहरा हैं। राजनीति भले कुछ भी कहती हो। वे मैदानी नेता हैं, और उन्हें वही रहना भी चाहिए। पिछले सप्ताह इंदौर नगर निगम के कार्यक्रम में पंडाल गिरने पर जो शिवराज दिखे थे, वैसे ही अभी भी दिखने चाहिए। निश्चित ही एक चूक ने उनकी राजनीति और प्रशासन दोनों पर सवाल लगा दिया। इन सवालों के जवाब वक्त नहीं शिवराज सिंह को खुद ही देने होंगे।
पुलिस फायरिंग में 6 किसानों की मौत के बाद मंदसौर में पुलिस अधीक्षक और प्रशासनिक तबादले किए गए। पर बड़ा मुद्दा ये है कि क्या सिर्फ एक-दो तबादले पूरी व्यवस्था को दुरुस्त कर देंगे? जांच होनी चाहिए कि आखिर किसके आदेश पर गोली चली और क्यों? आखिर शिवराज के करीबी अफसर इतने बड़े आंदोलन के खतरे को पढ़ क्यों नहीं सके? सीधी बात है अफसरों की मंडली फीलगुड में जी रही है। ये मंडली मुख्यमंत्री को भी वही दिखा रही है, जो बंद कमरों से वो देख रही है। सरकार के शीर्ष में अभी जो अफसर हैं, उनमें से आधे से ज्यादा वही हैं, जो दिग्विजय के कार्यकाल में भी कुछ ऐसी ही जिम्मेदारी पर थे। दिग्विजय को भी ये ऐसी ही रिपोर्ट देते रहे, कही कोई गुस्सा नहीं, सब खुश हैं। बिजली कटौती, शहरी लोगों के वोट नहीं चाहिए, सवर्णो के वोट की मुझे जरूरत नहीं जैसे बेतुके दिग्विजय के बयानों को भी अफसरों ने बहुत खूब, ‘राजा साहब’ कहकर कसीदे कढ़े। इन दरबारी अफसरों ने ही कांग्रेस की सत्ता का नाश किया। यदि ये वक्त रहते दिग्विजय को जमीनी हकीकत बताते तो शायद कुछ हालात सुधरते। शिवराज और दिग्विजय के कार्यकाल की कोई तुलना नहीं। ऐसे दरबारी अफसरों के कारण ही किसानों की असली परेशानी सामने नहीं आ सकी। आंदोलन की उग्रता ये साबित करती है कि आग लंबे समय से धधक रही है। अभी भी वक्त है, ऐसे अफसरों को हटाकर नए चेहरे लाए जाएं। इतिहास गवाह है कि अफसरों की गलती ने हमेशा राजनेताओं और सरकारों को खत्म किया है। अफसर भी ये जानते हैं कि आज तबादला, कल वापसी तय है। शिवराज सिंह को अपनी कार्यशैली और आक्रामक करनी ही होगी, उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सीखना चाहिए। नीतीश कुमार ने अफसरों और मंत्रियों पर भरोसा किया पर पूरा भरोसा कभी नहीं किया। कई स्तरों पर अफसरों की भी ट्रैकिंग नीतीश कुमार करते रहते हैं। यही सफलता का फार्मूला है। 
इस आंदोलन से एक और बात सामने आई कि संघ से जुड़े किसान संगठन और बीजेपी का अपना नेटवर्क कहां गुम हो गया। इसकी भूमिका भी कमजोर रही। बीजेपी का संगठन, विधायक और वरिष्ठ नेता भी खामोश रहे। आंदोलन के आठ दिन में किसी भी बीजेपी के विधायक या वरिष्ठ नेता ने अपने इलाके के किसानों को समझाने की कोशिश तक नहीं की। कहीं ऐसा कुछ सामने नहीं आया। क्या मंत्रियों ने अपने इलाकों में कोई कोशिश की? नहीं। क्यों? इसका भी जवाब तलाशा जाना चाहिए। बीजेपी जैसी संगठनात्मक पार्टी के लिए ये भी एक चेतावनी है। क्या बीजेपी भी कांग्रेस बनती जा रही है। खैर, इस सबके बावजूद आज भी निर्विवाद रूप से शिवराज प्रदेश के सबसे पसंदीदा नेता हैं। उनके चेहरे और कामों की चमक इस मामले से धुंधली जरूर हुई है। पर वे इस धुंध को हटा सकते हैं पर अपनी सच्चाई से। शिवराज को चाहिए कि दरबारी अफसरों और जमीनी हकीकत से कट चुके मंत्रियों के भरोसे रहने, उनकी सलाह मानने के बजाय खुद पूरे प्रदेश में किसानों की चौपाल लगाएं। एक-एक इलाके में जाएं और किसानों को समझाएं, उनसे पूछे-क्या दिक्कत हैं। मुख्यमंत्री को 51 जिलों में 51 चौपाल करनी चाहिए। साथ में कृषि मंत्री, संबंधित विभागों के अफसरों के सामने किसानों से खुलकर चर्चा करनी चाहिए। संभव है, ये चौपाल दस से बारह घंटे तक चले। पर शिवराज एक किसान के बेटे हैं और दस बारह-घंटे उन्हें थकाएंगे नहीं इस बात का भरोसा तो किया ही जा सकता है। ये कठिन जरूर है पर करना ही होगा, और दोषियों को तत्काल सजा भी सुनानी होगी। ये चौपाल और लोगों से सीधा संपर्क शिवराज को अन्नदाता के सामने नायक साबित करेगा। वे इस प्रदेश के कभी न भुलाने वाले नायक बन जाएंगे। वरना, जनता को भूलते देर भी नहीं लगेगी। रामायण के सुंदरकांड में कहा गया है -
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास 

Sunday, June 4, 2017

पौरुषविहीन प्रशासनिक, पुलिस व्यवस्था,जनप्रतिनिधि भी निकम्मे और बेशर्म

पिछले तीन दिनों से पूरा इंदौर शहर बंधक है। किसानों (शहरी) प्रशासन और राजनेताओं के सौजन्य से हमारी जिंदगी पर खुलेआम प्रहार हो रहा है। जिंदा रहने की आजादी तक खतरे में दिख रही है। तीन दिनों में किसानों का प्रदर्शन और जनता की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। लोग दूध और सब्जी के लिए मारे-मारे घूम रहे हैं। महिलाओं के हाथ से सब्जी लूटी जा रही है। औरतों, बच्चों के दोपहिया वाहन तक रुकवाकर उनकी चेकिंग की जा रही है। एक तरह से जिस आदमी के भी हाथ में दूध और सब्जी दिख जाए उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। ये सब हो रहा है, पुलिस और प्रशासन  के सामने। पर कहीं किसी स्तर पर चिंता, बेचैनी या इन उपद्रवियों से निपटने का कोई इंतजाम नहीं दिखता। पहले ही दिन से पूरे आंदोलन को बेहद हलके में लिया। प्रशासन इसकी गंभीरता पढ़ने में विफल रहा। इसका नतीजा, शनिवार रात किसान हिंसक हो गए। रानीपुरा  हादसा, निगमकर्मी की हत्या या किसान आंदोलन, शासन की ऐसी चूक का भुगतान कब तक आम आदमी करेगा, और क्यों? आखिर कोई इसकी जिम्मेदारी लेगा। जवाब देगा?

ऐसा नहीं है कि सब कुछ अचानक हुआ। पहले ही दिन से उग्रता दिखाई दे गई थी। लोग देर रात तक दूध की दुकानों पर कतार लगाते दिखे। कई बच्चे दूध को तरस गए, मरीज परेशान हैं। पर अफसरों ने कागजों पर जमकर सबकुछ ठीक होने का भ्रम पैदा किया। जैसे- हालात सुधर रहे हैं, कल से आपूर्ति सामान्य, उज्जैन से दूध आएगा, साँची करेगा पूरी व्यवस्था, प्रशासन की निगरानी में बंटेगा कई हजार लीटर दूध। पर हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसी अफसर ने आखिर इसे मैदानी तौर पर जांचने की जहमत क्यों नहीं उठाई। क्या कोई अफसर है जो सामने आकर ये कह सके -मैंने पूरा शहर घूमा। शायद कोई भी अफसर ऐसा नहीं कह  सकेगा। यदि अफसर मैदान में उतरता है तो उसका असर निचले स्तर तक दिखता है। उपर से यदि कोई प्रशासनिक विफलता पर सवाल उठा दे, तो अफसर बिफर पड़ते हैं, उनका जवाब होता है- आप ही संभाल लीजिए। 

नए दौर में स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, आॅनलाइन व्यवस्था, थंब सिस्टम और अवार्ड बटोरने के लिए बनती योजनाओं के लिए ही अफसर खड़े दिखते हैं। मंत्रियों के आगमन के अलावा अफसरों को कभी शहर को समझते नहीं देखा। आखिर आम आदमी से इतना दूर क्यों है अफसर ? आखिर क्यों नहीं पुलिस साये में दूध बंटवाने जैसे कोई व्यवस्था की गई। इस मुद्दे पर पुलिस और प्रशासन की बीच कोई ठोस संयुक्त मीटिंग भी नहीं हुई। एक बार फिर ये बात सामने आई कि पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल नहीं है। दो शीर्ष अफसरों की आपसी खींचतान  भी बीजलपुर में शनिवार रात सामने आई। इसी खींचतान का नतीजा ये रहा कि पुलिस तीन घंटे बाद उपद्रवियों को खदेड़ पाई। 

दरअसल, किसानों के नाम पर ये राजनीति का खेल है। प्रदर्शन करने वाले सिर्फ एक इलाके विशेष से हैं। हिंसा करने वालों में किसान कितने हैं, ये भी जांच का विषय है।  किसानों की मांग  जायज है, पर उसको मनवाने का तरीका बेहद गलत है। किसी भी जनप्रतिनिधि को ये हक नहीं कि प्रदेश भर में अपनी राजनीति को चमकाने के लिए वो किसानों की आड़ में ऐसा हिंसक और जनता को दर्द देने वाला खेल खेले। बड़ा नेता बनने की चाह अच्छी है, रहनी भी चाहिए पर जनता की कीमत पर नहीं। इसके आंदोलन की आड़ में एक सुनियोजित राजनीतिक समीकरण है ये इसकी उग्रता से साबित होता है। आखिर प्रदर्शन करने वाले किसान सुतली बम  और पटाखे लेकर क्यों आये थे? आखिर रहवासी इलाकों में लोगों के घरों में बम कोई किसान तो नहीं ही फेंकेगा।  

शहर में हर कोई जानता है, ये सुतली बम, पटाखे और मिट्टी वाले अनार किस विधानसभा क्षेत्र में बनते, बिकते हैं। जरूरत है, इन पटाखों को सुलगाने वाले राजनेताओं के पहचानने की। क्या वोट और अपना कद बढ़ाने के लिए इस हद तक नीचे गिर जाएंगे हम। इस मामले में शहर के सभी जनप्रतिनिधियों की बेशर्मी और निकम्मापन भी उजागर हुआ। कश्मीर, गाय, प्रियंका चोपड़ा की ड्रेस जैसे मुद्दे पर भी मैदान संभालने वाले हमारे  विधायक, पार्षद, राजनेता तक इस मुद्दे पर सामने नहीं आए। शराब दुकानों की 

तोड़फोड़ पर शराब माफिया के पक्ष में खड़े होने वाले और शराब का वितरण ठीक से हो सके इसके लिए पुलिस की सुरक्षा दिलवाने से लेकर अपने पटठों की फौज लगवाने वाले दूध के वितरण के लिए क्यों सामने नहीं आये। किसी भी विधायक या पार्षद ने अपने इलाके में दूध और सब्जी के सुरक्षित वितरण के लिए न पुलिस मदद मांगी न खुद कुछ किया। अफसरों को छोड़िये, आखिर राजनेता किस मुँह से जनता के बीच घूमते हैं, उन्हें शर्म नहीं आती अपने नाकारापन पर।  वक्त है राजनीति के इस खेल में दूध का दूध और पानी का पानी करने का। 

आखिर इस आंदोलन से किसे क्या मिला ? किसानों को तो निश्चित ही कुछ नहीं मिला, मिलने की कोई संभावना भी नहीं। हकीकत ये है कि गांव में बड़ा वर्ग परेशान है, आखिर रोज इतना दूध वो कहां संभाले। एक करोड़ से ज्यादा के फल और सब्जी मंडी में सड़ गए है। कई हजार लीटर दूध बर्बाद हो चुका है। ट्रकों में भी फल और सब्जियां बर्बाद हो रही है। बच्चे दूध को तरस रहे हैं। आखिर इस तरह की त्रस्तता आम आदमी कब तक झेलेगा। 

रामधारी सिंह दिनकर ने शायद जनता को जगाने के लिए ही ये पंक्तियाँ लिखी होगी-- 
आज घना अंधकार तेरे पौरुष को चुनौती दे रहा है। नींद से जाग! आलस्य को झाड़ कर उठ खड़ा हो!  
वक्त है, इस पौरुषविहीन व्यवस्था को बदलने का।