Friday, November 2, 2018

टिकट के हवन कुंड में कांग्रेस की "स्वाहा" रस्म

दिग्विजय और ज्योतिरादित्य के बीच राहुल गांधी के सामने टिकट को लेकर जो भिड़ंत हुई, वो कांग्रेस को कहां ले जाये
गी, इस पर प्रजातंत्र में मेरी टिप्पणी

Thursday, April 26, 2018

हार के फॉर्मूले को सींचती कांग्रेस


हार के फॉर्मूले को सींचने का काम कांग्रेस बखूबी कर रही है. हर चुनाव के बाद खूब मंथन होता है. पर अगले चुनाव में फिर वही "देखाभाला"फार्मूला ओढ़ने में पार्टी को महारत हासिल है. कांग्रेस के तजुर्बेकार (हार) नेता उसी फॉर्मूले को हरा-भरा कर चुनावी बागीचे में पेश कर देते हैं. मानो, पराजय के फॉर्मूले को सावधि जमा कर दिया हो, पांच साल बाद ये दोगुना होकर पार्टी के खजाने में जमा हो जाता है. इसी जमा खजाने की उपज है मध्यप्रदेश कांग्रेस का चुनावी फैसला. कमलनाथ-ज्योतिरादित्य की जोड़ी. ऐसी जोड़ी पिछले विधानसभा चुनाव में कांतिलाल भूरिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया की थी. इस बार खजाने से ब्याज के तौर पर चार कार्यकारी अध्यक्ष भी निकले हैं. जीतू पटवारी, बाला बच्चन, सुरेंद्र चौधरी, रामनिवास रावत. रिज़र्व बैंक गवर्नर की तरह इस ब्याज और मुनाफे पर निग़ाहें लगाये बैठे दिग्विजय सिंह तो हैं ही. कांग्रेस 2013 में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव हारी. ताज़ा फैसलों से लग रहा है, कांग्रेस अभी भी वहीँ खड़ी है. कोई विशेष विचार, नयापन नहीं. पांच साल में पार्टी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी. इसमें चकित कर देना कुछ नहीं. ठहरे हुए पानी को उलीचकर नया बताने की कोशिश कांग्रेस के भीतर समा चुकी है. ताज़ा टीम भी ऐसा ही ठहरा हुआ पानी दिख रही है.
 कांग्रेस के ताज़ा फॉर्मूले और पिछली हार कितनी एक सी, समझते हैं...

2013 में कांतिलाल अब कमलनाथ
पिछले विधानसभा चुनाव के चेहरे याद करिये. कांतिलाल भूरिया-ज्योतिरादित्य सिंधिया.  इस बार क्या बदला? ज्योतिरादित्य वही हैं, जहाँ पिछली बार थे-चुनाव अभियान प्रभारी. बहुत थोड़ा सा बदलाव. भूरिया की जगह कमलनाथ. अंतर है तो धनशक्ति का.  चुनाव  में पैसा खर्च करने की ताकत भूरिया से ज्यादा कमलनाथ के पास है. बाकी सब वही का वही. परदे के पीछे के आका भी नहीं बदले. भूरिया के पीछे दिग्विजय रहे तो कमलनाथ का नाम भी दिग्विजय की फिरकी से ही निकला है. क्या कमलनाथ और भूरिया में कोई बड़ा अंतर है. शायद नहीं. पार्टी में और बाहर कमलनाथ जरूर बड़ा नाम दिखते हैं. दोनों सांसद हैं, केंद्र में मंत्री रहे. दोनों सीमित क्षेत्र तक सीमित नेता हैं. दोनों कम बोलने और बयानबाजी से दूरी रखते हैं. समर्थकों के मामले में कमलनाथ भूरिया से थोड़ा आगे हैं. पर उनके समर्थक प्रदेश में छितरे हुए हैं.   भूरिया आदिवासियों के और आम जनता में अपना सा चेहरा तो रहे हैं, पर कमलनाथ का चेहरा जनता के लिए पराया सा है. इस तुलना का मकसद भूरिया या कमलनाथ के कद को मापना नहीं है. इसे बताना इसलिए जरुरी है कि कांग्रेस ने पांच साल में क्या सबक लिया, क्या बदलाव किये. बेशक मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से है, पर जब तक आप अपनी पुरानी कमजोरियों को नहीं मापेंगे नया कैसे गढ़ेंगे. आखिर कमलनाथ को कमान सौंपकर पार्टी क्या हासिल करना चाहती है. वही पुराने परिणाम?

2013 की लेटलतीफी अब भी कायम
पूरे देश से सिमटती कांग्रेस अब भी खुद को अखिल भारतीय पार्टी मानकर जी रही है. टिकट बंटवारे से लेकर नेता चुनने तक में वही भाव बना हुआ है. मध्यप्रदेश में पिछले पांच साल से बेकार बैठी पार्टी अब क्यों काम पर लगी. लेटलतीफी कांग्रेस के डीएनए में समा चुकी है. गोवा में इसी कारण सबसे अधिक सीट जीतने के बावजूद पार्टी सरकार नहीं बना सकी.वहां के प्रभारी दिग्विजय सिंह थे. ये बताने का आशय कांग्रेस को कमतर बताना या दिग्विजय विरोध कतई नहीं है. सीधा सवाल कांग्रेस आलाकमान से है. आखिर कब तक शीर्ष नेतृत्व ऐसे फैसले लेता रहेगा. 230 विधानसभा सीट तक पहुंचने लायक वक्त तो कमलनाथ को मिलना ही चाहिए. एन चुनाव के वक्त उन्हें जिम्मेदारी देने का क्या तुक है. पिछले चुनाव में भी पार्टी ने एन वक्त पर ज्योतिरादित्य को चुनाव अभियान प्रभारी बनाया था. वे पूरी सीटों तक पहुँच ही नहीं पाये। अचानक ज्योतिरादित्य को लाने से उस वक्त भी कांग्रेस विभाजित हो गई थी और हार के सिवा कुछ बचा नहीं.
कैसे टिकेगा नया फार्मूला
क्षत्रपों में बंटी कांग्रेस को बीजेपी से पहले खुद से निपटना होगा. ये नया नहीं है. पर इस बार जो फार्मूला आया है वो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. इसमें बड़ी खामियां है. राजनीति में सही वक्त और उचित सम्मान से ही सबको साधा जा सकता है. कांग्रेस ने कई बड़े नेताओं को किनारे कर दिया. बंटवारा ठीक से नहीं हुआ.





कमलनाथ अध्यक्ष और ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनाव अभियान प्रभारी. यहाँ तक तो ठीक. पर चार कार्यकारी अध्यक्ष  विचार अच्छा है. पर इन पदों पर नियुक्ति कमजोर है. बेहतर होता चार कार्यकारी अध्यक्ष वरिष्ठ नेताओं को बनाया जाता. महेश जोशी, कांतिलाल भूरिया, सज्जनसिंह वर्मा, अजय सिंह, अरुण यादव कार्यकारी अध्यक्ष बनाये जाते. इससे इन नेताओं में जिम्मेदारी का अहसास रहता और अपने-अपने इलाकों में ये कमलनाथ के हाथ मजबूत करते. जीतू पटवारी, बाला बच्चन, सुरेंद्र चौधरी, रामनिवास रावत जैसे युवाओं को प्रचार अभियान समिति में रखा जाता. ये फार्मूला कमलनाथ, ज्योतिरादित्य और कांग्रेस तीनो के लिए फायदेमंद होता. कीचड होती कांग्रेस में कमल का खिलना और बीजेपी के कमल को पंजे में कैद करना आसान नहीं होगा.

Sunday, September 17, 2017

फ्लॉप होते सिनेमाघरों को सुपरहिट बना देने की कहानी है पीवीआर




90 के दशक में जब अमिताभ  बच्चन का शहंशाही दौर और सिनेमाघर दोनों ढलान पर थे. अमिताभ उम्र से संघर्ष कर रहे थे, तो टॉकीज पाइरेटेड सीडी से परेशान थे. लोग फैिमली के साथ सिनेमा देखने जाने से बच रहे थे , तभी एक बदलाव आया औ फिर  सिनेमाघर हुए हाउसफुल. मल्टीस्क्रीन का दौर शुरू किया पीवीआर ने.
---
आपका वीकेंड इनके बिना अधूरा है.  12 साल पहले तक परिवार के साथ फिल्म देखना एक मुश्किल काम था. तीन घंटे की फिल्म आपका पूरा दिन चौपट कर देती थी. पहले पहुंचों लाइन में लगो. टिकट मिली, तो ठीक. नहीं तो वापस खाली हाथ घर. मिल गयी, तो नया संघर्ष. सीट कैसी मिलेगी. हवादार जगह होगी या नहीं. एसी चलेगा या बंद होगा. परिवार के साथ छेड़छाड़ तो नहीं होगी.  इन सबका हल एक शख्स ने दिया. भारतीय फिल्मों को आप तक आराम से पहुंचाने वाले हीरो हैं- अजय बिजली.
ये अपने नाम को सार्थक करते हैं. मल्टीस्क्रीन थिएटर में ये अजेय हैं और बिजली की गति से इन्होंने विस्तार किया है. देश में पहला मल्टीस्क्रीन सिनेमाघर यही लाये. सिनेमा टिकट के धक्के बंद करने के लिए ऑनलाइन बुकिंग भी इनकी ही देन है. प्रिया विलेज रोड शो यानी पीवीआर. ये नाम इसलिए कि प्रिया नाम का दिल्ली में इनके पिता का सिनेमाघर रहा और ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोड शो के साथ देश का पहला मल्टीप्लेक्स शुरू हुआ. इस कंपनी ने 1997 में दिल्ली में अनुपम नाम से पहला सिनेमा घर शुरू किया. 19 साल में यह कंपनी दुनिया की टॉप टेन सिनेमा कंपनी में शामिल हो गयी.
वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम ने इसे सबसे तेज तरक्की वाली ग्लोबल कंपनी की सूची में रखा है. फिल्मी स्टोरी की तरह ही ये कंपनी भी आगे बढ़ी. अपने पहले 11 साल, यानी 2008 तक कंपनी ने 100 स्क्रीन और पहला डिजिटल लांच किया था. बाद के आठ साल कंपनी ने 401 नये स्क्रीन  शुरू किये. आज कंपनी 45 शहरों में  501 स्क्रीन की मालिक है. देश में फिलहाल वे एक हजार स्क्रीन का लक्ष्य लेकर चल रही है. इंडिया के सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक थिएटर का अवार्ड पीवीआर को मिला है.

जय बिजली की गति स्क्रीन पर बदलते सीन की तरह ही है. इसलिए वह कहते हैं, मेरा लक्ष्य तो समय के साथ बदलता रहता है. पीवीआर की दुनिया जितनी चमकीली है, उसके पीछे उतना ही गहरा संघर्ष भी है.
 अजय के पिता कृष्ण मोहन की दिल्ली में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी और प्रिया नाम का सिनेमाघर था.  1990 में भारत में अमिताभ बच्चन का शहंशाही दौर दरक रहा था और सिनेमा का धंधा भी. उस दौर में अजय अमेरिका गये. उन्होंने वहां के सिनेमाघर देखे, तो चमत्कृत हुए. लौट कर पिता से उन्होंने हॉलीवुड फिल्मों का धंधा करने की अनुमति मांगी. विदेशी कंपनीज ने कहा कि सिनेमाघर ठीक करो, तभी फिल्में देंगे.
बस, अजय लग गये और प्रिया का स्वरुप बदल गया. 1992 में उनके पिता चल बसे. 1995 में अजय ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी से एग्रीमेंट कर 1997 में अनुपम थिएटर को मल्टीस्क्रीन किया. 2001 में फिर गेम बदला, अमेरिका में आतंकी हमले के बाद विलेज रोड शो ने बिजनेस से हाथ खींच लिया. अब अपने दम पर ख्वाब पूरा करने को उन्होंने बैंक से लोन लिया. 2003 में बेंगलुरु में 11 स्क्रीन सिनेमाघर बना कर देश में घटते सिनेमाघरों को नयी राह दिखायी. पीवीआर ने थिएटर के साथ रेस्तरां और बॉउलिंग बिजनेस में भी पैसा लगाया. ऐसा नहीं है कि पीवीआर सिर्फ रईसों के लिए है. यदि महंगा पीवीआर गोल्ड है, तो कस्बों के लिए पीवीआर टॉकीज का कांसेप्ट भी है.



Thursday, August 17, 2017

सियासत पर भारी है ये तस्वीर


ये तस्वीरें असली है. और लगभग डूब चुके इन लोगों का ज़ज़्बा भी एक दम खरा. ये खालिस देशभक्त हैं. तिरंगे की शान में खड़े ये लोग ही असल हिंदुस्तान है. इनके दम पर ही देश अब तक ज़िंदा है. ये वो लोग हैं, जो कहते नहीं सिर्फ करते हैं. ये तस्वीर बिहार के सीमावर्ती इलाके की हैं. सोचिये, एक इलाका  जो बाढ़ से डूबा है, हर पल मौत और तबाही की खबर आ रही हो, ऐसी तबाही के बीच भी आज़ादी का जश्न मनाने का ज़ज़्बा तमाम ज़ज़्बों से ऊपर है. दूसरी तस्वीर में एक पिता अपने बच्चे को कंधे पर लादकर स्कूल ले जा रहा है, इसी जश्न के लिए. तीसरे में जवान सलामी देने को खड़े हैं. कमर तक पानी में डूबकर तिरंगा फहराने की ये जिद और भक्ति लाल किले पर तिरंगा फहराने वालों से कही बड़ी है. जनपथ की पूरी सलामी के  हक़दार ऐसे ही लोग हैं. क्या इन्हे हक़ मिलेगा?

ये तस्वीर भले बाढ़ की हो पर इस देश का देशभक्त आम आदमी पिछले सत्तर सालों से ऐसे ही डूब में खड़ा है. साल दर साल आश्वासनों की  सरकारी नाव के बावजूद उसकी ज़िंदगी की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. पहले, राशन, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ, मकान, रोजगार नहीं थे, अब  ये सब हैं तो उसकी पहुंच से बाहर. कारण? अब सरकारें व्यावसायिक हो गई है, उन्हें सब्सिडी अखरती है, वे हर चीज़ में मुनाफा तलाश रहे हैं. चाणक्य ने कहा है-जब राजा व्यापारी हो जाता है तो प्रजा भिखारी हो जाती है. साल दर साल इस देश में राजा कुशल व्यापारी बनते गए, और आम आदमी बेनाम। क्या सरकारें इन्हे नाम देंगी? 

एक तरफ ये ज़ज़्बा है, दूसरी तरफ सरकारों को देखिये. एक देश में कितने देश पनप गए हैं. ममता बनर्जी अपने हिसाब से आज़ादी चाहती है, तो कर्नाटक की सरकार अपना अलग झंडा और गीत बनाने पर आमादा है. केरल में संघ प्रमुख के एक स्कूल में तिरंगा फहराने पर वहां के कलेक्टर को आपत्ति है, उत्तरप्रदेश में बच्चों की मौत के बाद भी जश्न जारी है. बिहार में सत्ता का खेल, कश्मीर में पत्थर और गुजरात में राज के लिये नीति का गिरता स्तर, कहीं कोई गोडसे का मंदिर बनाने पर आमादा है तो राजस्थान की सरकार गांधी को मिटाने की कोशिश में लगी है. शर्म आती है ऐसी आज़ादी पर. गर्व का मौका मिलेगा? 

  एक नया दौर सोशल मीडिया से पनपा है, ट्रोलिंग और भक्ति का मुजाहिरा। इसके लिए भक्तों की टोलियां है. ये लगभग सभी दलों के पास है. होली पर कीचड़ उड़ाने वाली टोली की तरह ही ये टोलियां है. ये कौम, जाति, राजनीति, रंग के आधार पर घृणा फैलाती हैं. इसने देशभक्ति को एक नया रंग दिया है. जो हम कहे वो सही, हमसे अलग बोले तो देशद्रोही। आखिर दबाव में जीने को कैसे आज़ादी कहेंगी. वरिष्ठ इतिहासकार लालबहादुर वर्मा ने लिखा है- हम आज़ाद होने पर ही अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं. नेहरू से लेकर आज तक किसी सरकार ने जनता को सर्वश्रेष्ठ देने की आज़ादी ही नहीं दी. स्कूलों में वंदे मातरम, घरों में बेटियों के कपड़ों पर सवाल, इश्क़ पर बवाल, मर्जी का खाने पर जान की जोखिम. गौरक्षा के नाम पर मिटा देने की साज़िश, तीन तलाक पर मूल मुद्दे पर बात के बजाय इसे सेक्स, मजे और मस्ती से जोड़ने की कोशिश, आखिर कितना विरोधाभास। क्या यही आज़ादी है ? राष्ट्रकवि  नीरज ने सही लिखा है - 
जागते रहिए , ज़माने को जगाते रहिए 
मेरी आवाज में आवाज मिलाते रहिए 
भूखा सोने कोई भी तैयार है, मेरा देश 
आप परियों के उसे ख्वाब  दिखाते रहिये. 

तस्वीर बदलने की उम्मीद के साथ, जय हिन्द !

Friday, July 28, 2017

नीतीश की राजनीति की सबसे बड़ी चूक अब वे कभी नायक नहीं बन सकेंगे

बिहार में जो हुआ वो होना ही था। इसमें कुछ भी नया और चौकाने वाला नहीं है। जिस गठबंधन को लोग बीस दिन देने को राजी नहीं थे, वो बीस महीने चल गया। बड़ी कामयाबी। पर इस सबसे जो सबसे नाकामयाब हुआ, जिसका नाम, रौब, रुतबा, सम्मान और ठसक, ठनक कम हुई वो हैं नीतीश कुमार। अभी भले नीतीश फिर शपथ लेकर विजेता दिख रहे हों पर असल में वो अपनी राजनीति का सबसे बड़ा मौका चूक गए। नीतीश ने देश में एक विचारवान, गंभीर सत्तास्वार्थी नेता से अलग पहचान बनाई है। ताजा टूट, समर्थन और शपथ ने उनकी इस अलग नेता की छवि को तोड़ दिया है। अब वे भी एक सामान्य नेता हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी कर सकता है। यही कारण है, जननायक, सुशासन कुमार, पर आज सवाल उठ रहे हैं। राहुल उन्हें धोखेबाज, लालू हत्यारा और मोदी नायक बताने में लगे हैं। यही नीतीश हैं जिनके पीछे कांग्रेस खड़ी हुई, लालू ने इन्हें भाई बताया और मोदी ने नीतीश के डीएनए को ही गड़बड़ कह डाला। आज सब कुछ उलट है। अपने पराए और पराए अपने। नीतीश की राजनीति की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उनकी विचारधारा, दोस्ती, दुश्मनी कुछ भी स्थायी नहीं। कभी वे गैरकांग्रेसी तो कभी गैरसंघी, गैरभाजपाई सरकार के पैरोकार बन जाते हैं। बावजूद इसके वो कभी कांग्रेस के साथ सरकार बनाते हैं तो कभी बीजेपी के साथ। इसे क्या कहेंगे। यथार्थवादी, समाजवादी, अवसरवादी। कभी लालू दोस्त, मोदी दुश्मन, कभी इसके एक दम उलट। भारतीय राजनीति का यही मिजाज है। नीतीश ने भी जो सब करते वही किया। जब कोई नेता ऐसा करता है तो इसका साफ मतलब है अब वो सत्ता के अधीन एक कठपुतली है, नायक तो वो हो ही नहीं सकता। 
 दरअसल नीतीश के करीबी जानते हैं कि वे प्रशासक अच्छे हैं, पर नेता कमजोर। नीतीश बेहद आराम, सुविधा, सत्ता की राजनीति चुनते हैं। वे दरअसल नोकरशाह सरीखे हैं, जहां अवसर हो उसे चुन लो। 2014 के आम चुनाव में हार के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया, जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। खुद ऐलान किया कि वे अब संगठन को मजबूत करेंगे। पूरे प्रदेश और देश का दौरा करेंगे। भाजपा, संघ और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ेंगे। लम्बा-चौड़ा प्लान बना। पर हुआ कुछ नहीं। वे दो-चार सभा से ज्यादा कुछ कर नहीं पाए। आराम की सियासत के लिए फिर मुख्यमंत्री बन गए। अपनी इसी आरामतलबी के लिए बार-बार नैतिकता, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार का आवरण ओढ़ लेते हैं। उनके राजनीतिक वॉर्डरोब में सभी विचारधाराओं, रंगों के रेडीमेड आवरण टंगे हुए हैं। वे अपनी सुविधा के हिसाब से उसे ओढ़ लेते हैं। अभी उन्होंने भगवा ओढ़ लिया है,पता नहीं कल क्या ओढ़ लेंगे। आखिर इतने रंग बदलने के बाद भी नीतीश का रंग क्यों नहीं उतरता। इसकी साफ वजह है, वे जिसके भी साथ होते हैं, उसकी खूब प्रशंसा करते हैं, जब उसके विरोधी हो जाते है तो कोसने में भी बेजोड़ हैं। चुनाव के वक्त उन्होंने ही कहा था-भाजपा के साथ जाने के बजाय मिटटी में मिल जाऊंगा। भाजपा का जिस तरह का देश में विपक्ष खत्म करने का दौर है निश्चित ही नीतीश की राजनीति अब मिट्टी ही होती दिख रही है। भाजपा उन्हें अब उभरने देगी, ऐसा कोई नासमझ ही कह सकता है।

खैर, नीतीश ने मोदी की आंधी को रोककर बिहार में सरकार बनाई थी। भले वो सजायाफ्ता लालू के सहारे रही हो। उस सरकार के साथ देश ने नीतीश को एक उम्मीद वाले नेता के तौर पर देखा। खत्म होते विपक्ष और रीढ़विहीन नेताओं की मंडली में वे चमकते सितारे से रहे। बेहतर होता नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बनने के बजाय, सत्ता ही छोड़ देते। इससे निश्चित उनका कद बढ़ता। देश को इस वक्त एक मजबूत विपक्षी नेता की जरुरत है। यदि वे सत्ता छोड़ देते तो ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे सहित तमाम विपक्षी नेता उन्हें अपना नेता मान लेते। लालू के साथ होने के कारण उनकी स्वीकार्यता कम थी, पर लालू का साथ छोड़कर भाजपा के साथ जाने से उनका दायरा सिर्फ भाजपा तक सीमित रह गया। अब वे एक भाजपा या कहिए मोदी के अधीन हैं। अब नीतीश के काम, नाम सब मोदी की दें होंगे। भाजपा के साथ इस तरह घुल जाएंगे-जैसे पानी में चीनी। बेहतर होता नीतीश अपने गुरु संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण का रास्ता अपनाते। इस देश को इस वक्त फिर एक जेपी की जरूरत है। नीतीश वो जरूरत पूरी कर सकते थे। नीतीश ने खुद को अब मुख्यमंत्री तक सीमित कर लिया, वे देश के नेता बन सकते थे। नीतीश ने इतिहास में दर्ज होने का एक बड़ा अवसर खो दिया। चलते-चलते बशीर बद्र की दो पंक्तियां-
उसी को हक है, जीने का इस जमाने में
जो इधर का दिखता रहे और उधर का हो जाए।

Saturday, June 24, 2017

मौत में स्वार्थ तलाशते डॉक्टर और नेता

प्रदेश का सबसे बड़ा इंदौर का एमवाय अस्पताल तीन दिन से चर्चा में है। मरीजों की मौत का सच, उसके कारण और लापरवाही अभी तय होना बाकी है। सभी संदेह के घेरे में हैं। मरीजों की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, पर उस मौत से लाभ उठाने की कोशिश शर्मनाक है। लोगों की जिंदगियां बनाने, बचाने का जिम्मा यदि किसी के पास है तो वो हैं-डॉक्टर और नेता। एक जीवन बचाने की और दूसरा समाज गढ़ने की शपथ लेता है। एमवाय हॉस्पिटल की घटना में दोनों ने अपना सम्मान खो दिया। 17 मरीजों की मौत को अपनी रंजिश, निजी ईर्ष्या का बदला लेने के लिए इस्तेमाल किया वरिष्ठ चिकित्सक रामगुलाम राजदान ने। राजदान ने मीडिया के एक वर्ग को प्रभाव में लेकर आॅक्सीजन की कमी से मौत की अफवाह फैलाई। उन्होंने बड़े शातिराना तरीके से ये स्थापित किया कि 24 घंटे में 17 मौत हो गई, जबकि राजदान खुद अच्छे से जानते हैं कि एमवाय हॉस्पिटल में रोज इतनी मौत सामान्य हैं। राजदान सस्पेंड कर दिए गए। ये प्रशासनिक प्रक्रिया है। संभव है, कुछ दिनों में राजदान बहाल भी हो जाएं। पर राजदान के जुर्म ने मरीजों और उनके करीबियों के दिमाग में जो अविश्वास और डर पैदा किया है, उसे कोई भी निलंबन और बर्खास्तगी नहीं भर सकेगी। दूर दराज से सैकड़ों लोग रोज इलाज के लिए इंदौर आते हैं, उम्मीद के साथ। राजदान जैसे लोग उन उम्मीदों को कमजोर कर देते हैं। लोगों में एक डर पैदा होता है कि एमवाय जाएंगे तो पता नहीं बचेंगे या नहीं। ये वो अस्पताल है, जहां तमाम कमियों के बावजूद सबसे मुश्किल आॅपरेशन होते हैं। तमाम चकाचौंध वाले फाइव स्टार हॉस्पिटल भी जिन मरीजों का इलाज करने में नाकाम रहते हैं, उसे कामयाब बनाते हैं बड़े अस्पताल के डॉक्टर। रात-दिन ईमानदारी से काम करने वाले डॉक्टर्स, नर्सें, सफाईकर्मी और इसे सुपरस्पैशिएलिटी का दर्जा दिलवाने के लिए संघर्ष करने वाले अफसरों की भी बदनामी ऐसे ‘गुलाम’ विचारों के कारण होती है।
अब, आते हैं राजनीति पर। कांग्रेस ने शुक्रवार को जो किया वो उसके पतन को सही साबित करता है। जिस ढंग से कांग्रेस के नेताओं ने एक मृतक के बेटे को घर से उठाकर प्रदर्शन में खड़ा कर लिया वो किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता। गलत का विरोध जरूरी है, सही बात सामने लाना आपका हक है, पर सच की खोज में ऐसा संवेदनाहीन, विचारविहीन प्रदर्शन? तस्वीरों में देखिए, एक मौत की आड़ में पूरी पार्टी खड़ी दिखाई दे रही है। कैसे मुआवजा दिलवाने का लालच देकर एक बेटे को अपनी घिनौनी राजनीति का चेहरा बनाया जा सकता है? क्या कांग्रेस में अपनी खुद की इतनी भी ताकत और नैतिकता नहीं बची कि वो अपनी आवाज रख सके। क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को इतनी तमीज भी नहीं रही कि कब क्या करना है। उन्हें इस बात की भी शर्म नहीं कि जब सच सामने आएगा तो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे। कांग्रेस की झूठ की आभा कुछ घंटों में ही बुझ गई, जब मृतक के बेटे ने कहा कि आॅक्सीजन की कमी की कोई बात उसने नहीं कही, उसे तो मुआवजा दिलवाने का कहकर ले जाया गया था। आखिर कब ऐसी मानसिकता का इलाज होगा?