Thursday, August 17, 2017

सियासत पर भारी है ये तस्वीर


ये तस्वीरें असली है. और लगभग डूब चुके इन लोगों का ज़ज़्बा भी एक दम खरा. ये खालिस देशभक्त हैं. तिरंगे की शान में खड़े ये लोग ही असल हिंदुस्तान है. इनके दम पर ही देश अब तक ज़िंदा है. ये वो लोग हैं, जो कहते नहीं सिर्फ करते हैं. ये तस्वीर बिहार के सीमावर्ती इलाके की हैं. सोचिये, एक इलाका  जो बाढ़ से डूबा है, हर पल मौत और तबाही की खबर आ रही हो, ऐसी तबाही के बीच भी आज़ादी का जश्न मनाने का ज़ज़्बा तमाम ज़ज़्बों से ऊपर है. दूसरी तस्वीर में एक पिता अपने बच्चे को कंधे पर लादकर स्कूल ले जा रहा है, इसी जश्न के लिए. तीसरे में जवान सलामी देने को खड़े हैं. कमर तक पानी में डूबकर तिरंगा फहराने की ये जिद और भक्ति लाल किले पर तिरंगा फहराने वालों से कही बड़ी है. जनपथ की पूरी सलामी के  हक़दार ऐसे ही लोग हैं. क्या इन्हे हक़ मिलेगा?

ये तस्वीर भले बाढ़ की हो पर इस देश का देशभक्त आम आदमी पिछले सत्तर सालों से ऐसे ही डूब में खड़ा है. साल दर साल आश्वासनों की  सरकारी नाव के बावजूद उसकी ज़िंदगी की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. पहले, राशन, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ, मकान, रोजगार नहीं थे, अब  ये सब हैं तो उसकी पहुंच से बाहर. कारण? अब सरकारें व्यावसायिक हो गई है, उन्हें सब्सिडी अखरती है, वे हर चीज़ में मुनाफा तलाश रहे हैं. चाणक्य ने कहा है-जब राजा व्यापारी हो जाता है तो प्रजा भिखारी हो जाती है. साल दर साल इस देश में राजा कुशल व्यापारी बनते गए, और आम आदमी बेनाम। क्या सरकारें इन्हे नाम देंगी? 

एक तरफ ये ज़ज़्बा है, दूसरी तरफ सरकारों को देखिये. एक देश में कितने देश पनप गए हैं. ममता बनर्जी अपने हिसाब से आज़ादी चाहती है, तो कर्नाटक की सरकार अपना अलग झंडा और गीत बनाने पर आमादा है. केरल में संघ प्रमुख के एक स्कूल में तिरंगा फहराने पर वहां के कलेक्टर को आपत्ति है, उत्तरप्रदेश में बच्चों की मौत के बाद भी जश्न जारी है. बिहार में सत्ता का खेल, कश्मीर में पत्थर और गुजरात में राज के लिये नीति का गिरता स्तर, कहीं कोई गोडसे का मंदिर बनाने पर आमादा है तो राजस्थान की सरकार गांधी को मिटाने की कोशिश में लगी है. शर्म आती है ऐसी आज़ादी पर. गर्व का मौका मिलेगा? 

  एक नया दौर सोशल मीडिया से पनपा है, ट्रोलिंग और भक्ति का मुजाहिरा। इसके लिए भक्तों की टोलियां है. ये लगभग सभी दलों के पास है. होली पर कीचड़ उड़ाने वाली टोली की तरह ही ये टोलियां है. ये कौम, जाति, राजनीति, रंग के आधार पर घृणा फैलाती हैं. इसने देशभक्ति को एक नया रंग दिया है. जो हम कहे वो सही, हमसे अलग बोले तो देशद्रोही। आखिर दबाव में जीने को कैसे आज़ादी कहेंगी. वरिष्ठ इतिहासकार लालबहादुर वर्मा ने लिखा है- हम आज़ाद होने पर ही अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं. नेहरू से लेकर आज तक किसी सरकार ने जनता को सर्वश्रेष्ठ देने की आज़ादी ही नहीं दी. स्कूलों में वंदे मातरम, घरों में बेटियों के कपड़ों पर सवाल, इश्क़ पर बवाल, मर्जी का खाने पर जान की जोखिम. गौरक्षा के नाम पर मिटा देने की साज़िश, तीन तलाक पर मूल मुद्दे पर बात के बजाय इसे सेक्स, मजे और मस्ती से जोड़ने की कोशिश, आखिर कितना विरोधाभास। क्या यही आज़ादी है ? राष्ट्रकवि  नीरज ने सही लिखा है - 
जागते रहिए , ज़माने को जगाते रहिए 
मेरी आवाज में आवाज मिलाते रहिए 
भूखा सोने कोई भी तैयार है, मेरा देश 
आप परियों के उसे ख्वाब  दिखाते रहिये. 

तस्वीर बदलने की उम्मीद के साथ, जय हिन्द !

No comments:

Post a Comment