Sunday, December 17, 2017
Sunday, September 17, 2017
फ्लॉप होते सिनेमाघरों को सुपरहिट बना देने की कहानी है पीवीआर
90 के दशक में जब अमिताभ बच्चन का शहंशाही दौर और सिनेमाघर दोनों ढलान पर थे. अमिताभ उम्र से संघर्ष कर रहे थे, तो टॉकीज पाइरेटेड सीडी से परेशान थे. लोग फैिमली के साथ सिनेमा देखने जाने से बच रहे थे , तभी एक बदलाव आया औ फिर सिनेमाघर हुए हाउसफुल. मल्टीस्क्रीन का दौर शुरू किया पीवीआर ने.
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आपका वीकेंड इनके बिना अधूरा है. 12 साल पहले तक परिवार के साथ फिल्म देखना एक मुश्किल काम था. तीन घंटे की फिल्म आपका पूरा दिन चौपट कर देती थी. पहले पहुंचों लाइन में लगो. टिकट मिली, तो ठीक. नहीं तो वापस खाली हाथ घर. मिल गयी, तो नया संघर्ष. सीट कैसी मिलेगी. हवादार जगह होगी या नहीं. एसी चलेगा या बंद होगा. परिवार के साथ छेड़छाड़ तो नहीं होगी. इन सबका हल एक शख्स ने दिया. भारतीय फिल्मों को आप तक आराम से पहुंचाने वाले हीरो हैं- अजय बिजली.
ये अपने नाम को सार्थक करते हैं. मल्टीस्क्रीन थिएटर में ये अजेय हैं और बिजली की गति से इन्होंने विस्तार किया है. देश में पहला मल्टीस्क्रीन सिनेमाघर यही लाये. सिनेमा टिकट के धक्के बंद करने के लिए ऑनलाइन बुकिंग भी इनकी ही देन है. प्रिया विलेज रोड शो यानी पीवीआर. ये नाम इसलिए कि प्रिया नाम का दिल्ली में इनके पिता का सिनेमाघर रहा और ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोड शो के साथ देश का पहला मल्टीप्लेक्स शुरू हुआ. इस कंपनी ने 1997 में दिल्ली में अनुपम नाम से पहला सिनेमा घर शुरू किया. 19 साल में यह कंपनी दुनिया की टॉप टेन सिनेमा कंपनी में शामिल हो गयी.
वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम ने इसे सबसे तेज तरक्की वाली ग्लोबल कंपनी की सूची में रखा है. फिल्मी स्टोरी की तरह ही ये कंपनी भी आगे बढ़ी. अपने पहले 11 साल, यानी 2008 तक कंपनी ने 100 स्क्रीन और पहला डिजिटल लांच किया था. बाद के आठ साल कंपनी ने 401 नये स्क्रीन शुरू किये. आज कंपनी 45 शहरों में 501 स्क्रीन की मालिक है. देश में फिलहाल वे एक हजार स्क्रीन का लक्ष्य लेकर चल रही है. इंडिया के सबसे सुरक्षित और सुविधाजनक थिएटर का अवार्ड पीवीआर को मिला है.
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जय बिजली की गति स्क्रीन पर बदलते सीन की तरह ही है. इसलिए वह कहते हैं, मेरा लक्ष्य तो समय के साथ बदलता रहता है. पीवीआर की दुनिया जितनी चमकीली है, उसके पीछे उतना ही गहरा संघर्ष भी है.
अजय के पिता कृष्ण मोहन की दिल्ली में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी और प्रिया नाम का सिनेमाघर था. 1990 में भारत में अमिताभ बच्चन का शहंशाही दौर दरक रहा था और सिनेमा का धंधा भी. उस दौर में अजय अमेरिका गये. उन्होंने वहां के सिनेमाघर देखे, तो चमत्कृत हुए. लौट कर पिता से उन्होंने हॉलीवुड फिल्मों का धंधा करने की अनुमति मांगी. विदेशी कंपनीज ने कहा कि सिनेमाघर ठीक करो, तभी फिल्में देंगे.
बस, अजय लग गये और प्रिया का स्वरुप बदल गया. 1992 में उनके पिता चल बसे. 1995 में अजय ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी से एग्रीमेंट कर 1997 में अनुपम थिएटर को मल्टीस्क्रीन किया. 2001 में फिर गेम बदला, अमेरिका में आतंकी हमले के बाद विलेज रोड शो ने बिजनेस से हाथ खींच लिया. अब अपने दम पर ख्वाब पूरा करने को उन्होंने बैंक से लोन लिया. 2003 में बेंगलुरु में 11 स्क्रीन सिनेमाघर बना कर देश में घटते सिनेमाघरों को नयी राह दिखायी. पीवीआर ने थिएटर के साथ रेस्तरां और बॉउलिंग बिजनेस में भी पैसा लगाया. ऐसा नहीं है कि पीवीआर सिर्फ रईसों के लिए है. यदि महंगा पीवीआर गोल्ड है, तो कस्बों के लिए पीवीआर टॉकीज का कांसेप्ट भी है.
Thursday, August 17, 2017
सियासत पर भारी है ये तस्वीर
ये तस्वीरें असली है. और लगभग डूब चुके इन लोगों का ज़ज़्बा भी एक दम खरा. ये खालिस देशभक्त हैं. तिरंगे की शान में खड़े ये लोग ही असल हिंदुस्तान है. इनके दम पर ही देश अब तक ज़िंदा है. ये वो लोग हैं, जो कहते नहीं सिर्फ करते हैं. ये तस्वीर बिहार के सीमावर्ती इलाके की हैं. सोचिये, एक इलाका जो बाढ़ से डूबा है, हर पल मौत और तबाही की खबर आ रही हो, ऐसी तबाही के बीच भी आज़ादी का जश्न मनाने का ज़ज़्बा तमाम ज़ज़्बों से ऊपर है. दूसरी तस्वीर में एक पिता अपने बच्चे को कंधे पर लादकर स्कूल ले जा रहा है, इसी जश्न के लिए. तीसरे में जवान सलामी देने को खड़े हैं. कमर तक पानी में डूबकर तिरंगा फहराने की ये जिद और भक्ति लाल किले पर तिरंगा फहराने वालों से कही बड़ी है. जनपथ की पूरी सलामी के हक़दार ऐसे ही लोग हैं. क्या इन्हे हक़ मिलेगा?
ये तस्वीर भले बाढ़ की हो पर इस देश का देशभक्त आम आदमी पिछले सत्तर सालों से ऐसे ही डूब में खड़ा है. साल दर साल आश्वासनों की सरकारी नाव के बावजूद उसकी ज़िंदगी की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. पहले, राशन, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ, मकान, रोजगार नहीं थे, अब ये सब हैं तो उसकी पहुंच से बाहर. कारण? अब सरकारें व्यावसायिक हो गई है, उन्हें सब्सिडी अखरती है, वे हर चीज़ में मुनाफा तलाश रहे हैं. चाणक्य ने कहा है-जब राजा व्यापारी हो जाता है तो प्रजा भिखारी हो जाती है. साल दर साल इस देश में राजा कुशल व्यापारी बनते गए, और आम आदमी बेनाम। क्या सरकारें इन्हे नाम देंगी?
एक तरफ ये ज़ज़्बा है, दूसरी तरफ सरकारों को देखिये. एक देश में कितने देश पनप गए हैं. ममता बनर्जी अपने हिसाब से आज़ादी चाहती है, तो कर्नाटक की सरकार अपना अलग झंडा और गीत बनाने पर आमादा है. केरल में संघ प्रमुख के एक स्कूल में तिरंगा फहराने पर वहां के कलेक्टर को आपत्ति है, उत्तरप्रदेश में बच्चों की मौत के बाद भी जश्न जारी है. बिहार में सत्ता का खेल, कश्मीर में पत्थर और गुजरात में राज के लिये नीति का गिरता स्तर, कहीं कोई गोडसे का मंदिर बनाने पर आमादा है तो राजस्थान की सरकार गांधी को मिटाने की कोशिश में लगी है. शर्म आती है ऐसी आज़ादी पर. गर्व का मौका मिलेगा?
एक नया दौर सोशल मीडिया से पनपा है, ट्रोलिंग और भक्ति का मुजाहिरा। इसके लिए भक्तों की टोलियां है. ये लगभग सभी दलों के पास है. होली पर कीचड़ उड़ाने वाली टोली की तरह ही ये टोलियां है. ये कौम, जाति, राजनीति, रंग के आधार पर घृणा फैलाती हैं. इसने देशभक्ति को एक नया रंग दिया है. जो हम कहे वो सही, हमसे अलग बोले तो देशद्रोही। आखिर दबाव में जीने को कैसे आज़ादी कहेंगी. वरिष्ठ इतिहासकार लालबहादुर वर्मा ने लिखा है- हम आज़ाद होने पर ही अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं. नेहरू से लेकर आज तक किसी सरकार ने जनता को सर्वश्रेष्ठ देने की आज़ादी ही नहीं दी. स्कूलों में वंदे मातरम, घरों में बेटियों के कपड़ों पर सवाल, इश्क़ पर बवाल, मर्जी का खाने पर जान की जोखिम. गौरक्षा के नाम पर मिटा देने की साज़िश, तीन तलाक पर मूल मुद्दे पर बात के बजाय इसे सेक्स, मजे और मस्ती से जोड़ने की कोशिश, आखिर कितना विरोधाभास। क्या यही आज़ादी है ? राष्ट्रकवि नीरज ने सही लिखा है -
जागते रहिए , ज़माने को जगाते रहिए
मेरी आवाज में आवाज मिलाते रहिए
भूखा सोने कोई भी तैयार है, मेरा देश
आप परियों के उसे ख्वाब दिखाते रहिये.
तस्वीर बदलने की उम्मीद के साथ, जय हिन्द !
Friday, July 28, 2017
नीतीश की राजनीति की सबसे बड़ी चूक अब वे कभी नायक नहीं बन सकेंगे
बिहार में जो हुआ वो होना ही था। इसमें कुछ भी नया और चौकाने वाला नहीं है। जिस गठबंधन को लोग बीस दिन देने को राजी नहीं थे, वो बीस महीने चल गया। बड़ी कामयाबी। पर इस सबसे जो सबसे नाकामयाब हुआ, जिसका नाम, रौब, रुतबा, सम्मान और ठसक, ठनक कम हुई वो हैं नीतीश कुमार। अभी भले नीतीश फिर शपथ लेकर विजेता दिख रहे हों पर असल में वो अपनी राजनीति का सबसे बड़ा मौका चूक गए। नीतीश ने देश में एक विचारवान, गंभीर सत्तास्वार्थी नेता से अलग पहचान बनाई है। ताजा टूट, समर्थन और शपथ ने उनकी इस अलग नेता की छवि को तोड़ दिया है। अब वे भी एक सामान्य नेता हैं, जो सत्ता के लिए कुछ भी कर सकता है। यही कारण है, जननायक, सुशासन कुमार, पर आज सवाल उठ रहे हैं। राहुल उन्हें धोखेबाज, लालू हत्यारा और मोदी नायक बताने में लगे हैं। यही नीतीश हैं जिनके पीछे कांग्रेस खड़ी हुई, लालू ने इन्हें भाई बताया और मोदी ने नीतीश के डीएनए को ही गड़बड़ कह डाला। आज सब कुछ उलट है। अपने पराए और पराए अपने। नीतीश की राजनीति की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि उनकी विचारधारा, दोस्ती, दुश्मनी कुछ भी स्थायी नहीं। कभी वे गैरकांग्रेसी तो कभी गैरसंघी, गैरभाजपाई सरकार के पैरोकार बन जाते हैं। बावजूद इसके वो कभी कांग्रेस के साथ सरकार बनाते हैं तो कभी बीजेपी के साथ। इसे क्या कहेंगे। यथार्थवादी, समाजवादी, अवसरवादी। कभी लालू दोस्त, मोदी दुश्मन, कभी इसके एक दम उलट। भारतीय राजनीति का यही मिजाज है। नीतीश ने भी जो सब करते वही किया। जब कोई नेता ऐसा करता है तो इसका साफ मतलब है अब वो सत्ता के अधीन एक कठपुतली है, नायक तो वो हो ही नहीं सकता।
दरअसल नीतीश के करीबी जानते हैं कि वे प्रशासक अच्छे हैं, पर नेता कमजोर। नीतीश बेहद आराम, सुविधा, सत्ता की राजनीति चुनते हैं। वे दरअसल नोकरशाह सरीखे हैं, जहां अवसर हो उसे चुन लो। 2014 के आम चुनाव में हार के बाद उन्होंने इस्तीफा दिया, जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। खुद ऐलान किया कि वे अब संगठन को मजबूत करेंगे। पूरे प्रदेश और देश का दौरा करेंगे। भाजपा, संघ और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ेंगे। लम्बा-चौड़ा प्लान बना। पर हुआ कुछ नहीं। वे दो-चार सभा से ज्यादा कुछ कर नहीं पाए। आराम की सियासत के लिए फिर मुख्यमंत्री बन गए। अपनी इसी आरामतलबी के लिए बार-बार नैतिकता, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार का आवरण ओढ़ लेते हैं। उनके राजनीतिक वॉर्डरोब में सभी विचारधाराओं, रंगों के रेडीमेड आवरण टंगे हुए हैं। वे अपनी सुविधा के हिसाब से उसे ओढ़ लेते हैं। अभी उन्होंने भगवा ओढ़ लिया है,पता नहीं कल क्या ओढ़ लेंगे। आखिर इतने रंग बदलने के बाद भी नीतीश का रंग क्यों नहीं उतरता। इसकी साफ वजह है, वे जिसके भी साथ होते हैं, उसकी खूब प्रशंसा करते हैं, जब उसके विरोधी हो जाते है तो कोसने में भी बेजोड़ हैं। चुनाव के वक्त उन्होंने ही कहा था-भाजपा के साथ जाने के बजाय मिटटी में मिल जाऊंगा। भाजपा का जिस तरह का देश में विपक्ष खत्म करने का दौर है निश्चित ही नीतीश की राजनीति अब मिट्टी ही होती दिख रही है। भाजपा उन्हें अब उभरने देगी, ऐसा कोई नासमझ ही कह सकता है।
खैर, नीतीश ने मोदी की आंधी को रोककर बिहार में सरकार बनाई थी। भले वो सजायाफ्ता लालू के सहारे रही हो। उस सरकार के साथ देश ने नीतीश को एक उम्मीद वाले नेता के तौर पर देखा। खत्म होते विपक्ष और रीढ़विहीन नेताओं की मंडली में वे चमकते सितारे से रहे। बेहतर होता नीतीश फिर से मुख्यमंत्री बनने के बजाय, सत्ता ही छोड़ देते। इससे निश्चित उनका कद बढ़ता। देश को इस वक्त एक मजबूत विपक्षी नेता की जरुरत है। यदि वे सत्ता छोड़ देते तो ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, अरविंद केजरीवाल, उद्धव ठाकरे सहित तमाम विपक्षी नेता उन्हें अपना नेता मान लेते। लालू के साथ होने के कारण उनकी स्वीकार्यता कम थी, पर लालू का साथ छोड़कर भाजपा के साथ जाने से उनका दायरा सिर्फ भाजपा तक सीमित रह गया। अब वे एक भाजपा या कहिए मोदी के अधीन हैं। अब नीतीश के काम, नाम सब मोदी की दें होंगे। भाजपा के साथ इस तरह घुल जाएंगे-जैसे पानी में चीनी। बेहतर होता नीतीश अपने गुरु संपूर्ण क्रांति के जनक जयप्रकाश नारायण का रास्ता अपनाते। इस देश को इस वक्त फिर एक जेपी की जरूरत है। नीतीश वो जरूरत पूरी कर सकते थे। नीतीश ने खुद को अब मुख्यमंत्री तक सीमित कर लिया, वे देश के नेता बन सकते थे। नीतीश ने इतिहास में दर्ज होने का एक बड़ा अवसर खो दिया। चलते-चलते बशीर बद्र की दो पंक्तियां-
उसी को हक है, जीने का इस जमाने में
जो इधर का दिखता रहे और उधर का हो जाए।
Saturday, June 24, 2017
मौत में स्वार्थ तलाशते डॉक्टर और नेता
प्रदेश का सबसे बड़ा इंदौर का एमवाय अस्पताल तीन दिन से चर्चा में है। मरीजों की मौत का सच, उसके कारण और लापरवाही अभी तय होना बाकी है। सभी संदेह के घेरे में हैं। मरीजों की मौत दुर्भाग्यपूर्ण है, पर उस मौत से लाभ उठाने की कोशिश शर्मनाक है। लोगों की जिंदगियां बनाने, बचाने का जिम्मा यदि किसी के पास है तो वो हैं-डॉक्टर और नेता। एक जीवन बचाने की और दूसरा समाज गढ़ने की शपथ लेता है। एमवाय हॉस्पिटल की घटना में दोनों ने अपना सम्मान खो दिया। 17 मरीजों की मौत को अपनी रंजिश, निजी ईर्ष्या का बदला लेने के लिए इस्तेमाल किया वरिष्ठ चिकित्सक रामगुलाम राजदान ने। राजदान ने मीडिया के एक वर्ग को प्रभाव में लेकर आॅक्सीजन की कमी से मौत की अफवाह फैलाई। उन्होंने बड़े शातिराना तरीके से ये स्थापित किया कि 24 घंटे में 17 मौत हो गई, जबकि राजदान खुद अच्छे से जानते हैं कि एमवाय हॉस्पिटल में रोज इतनी मौत सामान्य हैं। राजदान सस्पेंड कर दिए गए। ये प्रशासनिक प्रक्रिया है। संभव है, कुछ दिनों में राजदान बहाल भी हो जाएं। पर राजदान के जुर्म ने मरीजों और उनके करीबियों के दिमाग में जो अविश्वास और डर पैदा किया है, उसे कोई भी निलंबन और बर्खास्तगी नहीं भर सकेगी। दूर दराज से सैकड़ों लोग रोज इलाज के लिए इंदौर आते हैं, उम्मीद के साथ। राजदान जैसे लोग उन उम्मीदों को कमजोर कर देते हैं। लोगों में एक डर पैदा होता है कि एमवाय जाएंगे तो पता नहीं बचेंगे या नहीं। ये वो अस्पताल है, जहां तमाम कमियों के बावजूद सबसे मुश्किल आॅपरेशन होते हैं। तमाम चकाचौंध वाले फाइव स्टार हॉस्पिटल भी जिन मरीजों का इलाज करने में नाकाम रहते हैं, उसे कामयाब बनाते हैं बड़े अस्पताल के डॉक्टर। रात-दिन ईमानदारी से काम करने वाले डॉक्टर्स, नर्सें, सफाईकर्मी और इसे सुपरस्पैशिएलिटी का दर्जा दिलवाने के लिए संघर्ष करने वाले अफसरों की भी बदनामी ऐसे ‘गुलाम’ विचारों के कारण होती है।
अब, आते हैं राजनीति पर। कांग्रेस ने शुक्रवार को जो किया वो उसके पतन को सही साबित करता है। जिस ढंग से कांग्रेस के नेताओं ने एक मृतक के बेटे को घर से उठाकर प्रदर्शन में खड़ा कर लिया वो किसी भी सूरत में सही नहीं कहा जा सकता। गलत का विरोध जरूरी है, सही बात सामने लाना आपका हक है, पर सच की खोज में ऐसा संवेदनाहीन, विचारविहीन प्रदर्शन? तस्वीरों में देखिए, एक मौत की आड़ में पूरी पार्टी खड़ी दिखाई दे रही है। कैसे मुआवजा दिलवाने का लालच देकर एक बेटे को अपनी घिनौनी राजनीति का चेहरा बनाया जा सकता है? क्या कांग्रेस में अपनी खुद की इतनी भी ताकत और नैतिकता नहीं बची कि वो अपनी आवाज रख सके। क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को इतनी तमीज भी नहीं रही कि कब क्या करना है। उन्हें इस बात की भी शर्म नहीं कि जब सच सामने आएगा तो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे। कांग्रेस की झूठ की आभा कुछ घंटों में ही बुझ गई, जब मृतक के बेटे ने कहा कि आॅक्सीजन की कमी की कोई बात उसने नहीं कही, उसे तो मुआवजा दिलवाने का कहकर ले जाया गया था। आखिर कब ऐसी मानसिकता का इलाज होगा?
Sunday, June 11, 2017
आखिर क्या हासिल हुआ ?
शनिवार को किसान आंदोलन (जायज मांग, नाजायज हिंसा, प्रताड़ना, मनमानी) का दसवां दिन बीता। किसानों का ये आंदोलन शुरू शहर का दाना-पानी बंद करने से हुआ। दो दिन की शांति के बाद इसमें राजनीति और उपद्रवी घुस गए। बस, यहीं से आंदोलन बिखर गया। कारण, इसके पीछे अपने हक की लड़ाई से ज्यादा उत्पात था। दरअसल आंदोलन करने वालों की मिट्टी अलग होती है। वे थकते नहीं, अनवरत अपने काम में लगे रहते हैं। उपद्रवी तो वक्ती होते हैं। क्या हिंसा, बसें फूंक देना, यातायात रोकना, लोगों को दूध, सब्जी के लिए तरसा देना किसी नतीजे पर ले जाएगा। थोड़ा पलटकर देखेंगे तो हम पाएंगे मात्र दस दिनों में हमने क्या-क्या खो दिया। सबसे पहले आर्थिक पहलू, प्रदेश की मंडियों और उससे जुड़े धंधों में कुल मिलाकर एक हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान प्रदेश ने झेला। इससे किसकी जेब कटी। निश्चित ही किसान की। आखिर किसानों ने ये कैसा आंदोलन चलाया जिसमें नुकसान भी उनका ही हुआ। इतने बड़े कारोबार का फायदा भी मिलता तो किसानों के परिवारों को ही। आखिर किस पर दबाव बनाया आपने। सरकार या अफसरों तक अपनी मांगे सही ढंग से पहुंचाने में आंदोलन विफल रहा। कारण, दूसरे ही दिन इसकी दिशा भटक गई। पूरी सरकारी मशीनरी और सरकार का ध्यान हिंसा से निपटने में लग गया, किसानों की मांगों पर नहीं। दूसरा, शहरों का दाना-पानी रोककर किसान जनता के बीच खलनायक बन गए।
मुख्यमंत्री के भोपाल के दशहरा मैदान में उपवास के पीछे भी किसानों के आंदोलन का दबाव नहीं, बल्कि हिंसा रोकने की कोशिश ज्यादा है। वे व्यथित दिखे। शिवराज ने साफ कहा, किसानों के साथ खड़ा हूं, मांगे भी मानूंगा। पर जनता की परेशानी की कीमत पर नहीं। राजधर्म निभाते हुए जनता की सुरक्षा भी करूंगा। हालांकि ये गौर करने वाली बात है कि मुख्यमंत्री के उपवास पर बैठने वाले दिन प्रदेश में कहीं कोई हिंसा नहीं हुई। शिवराज के उपवास के साथ ही प्रदेश की शांति ने ये भी साबित किया कि शिवराज जननेता हैं। लोगों को उनकी बात पर अब भी भरोसा है। शिवराज दरअसल वो चेहरा हैं जो गांव और शहर को जोड़ता है। जितना शहरी लोग उन्हें अपना मानते हैं, उतना ही किसान और ग्रामीण भी उन पर हक जताते हैं। पर इस आंदोलन ने शहर और गांव के इस जुड़ाव को भी तोड़ा है। दस दिनों में शहरों और गांवों के बीच एक दरार सी खिंच गई। ये आज भले न दिख रही हो, पर आगे के लिए खतरा है। आखिर किसका दाना-पानी रोका आपने? कभी सोचा? इंदौर, भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर जैसे शहरों में बड़ी संख्या में गांवों से आकर ही लोग रहते हैं।आपके बेटे-बेटी शहरों में आकर पढ़ते हैं। आपकी बेटी की ससुराल भी शहर में हो सकती है, आपके नाती-पोते भी दूध को तरसे होंगे। आखिर जनता का दूध, सब्जी बंद करने से क्या मिला?से महिलाओं और बच्चों को उतारकर उन्हें खेतों में दौड़ाना क्या सही तरीका है। क्या इन बसों में किसानों के परिवार नहीं थे? क्या अब हमें जातिवाद, क्षेत्रवाद के बाद शहरी और ग्रामीण संघर्ष का भी सामना करना पड़ेगा? ये आंदोलन किसान ही नहीं सरकार के लिए भी सबक है। दोनों, सोचें आखिर हासिल क्या हुआ ?Thursday, June 8, 2017
‘ब्रांड’ शिवराज अब भी विश्वसनीय, बशर्ते...
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सदमे में हैं। उनकी खामोशी इसका सबूत है। शिवराज सिंह इन दिनों दिखाई नहीं दे रहे हैं। जबकि हमेशा गायब रहने वाले राहुल गांधी मैदान में हैं। वे बोल भी रहे हैं। प्रदेश में किसानों पर फायरिंग और छह मौत का असर राजनीति पर साफ है। राहुल का दिखना और मुखर होना कितना असर करेगा। ये वक्त तय करेगा। पर शिवराज की खमोशी बड़ा नकारात्मक असर करेगी। शिवराज एक ऐसे शख्स हैं, जो काम में भरोसा रखते हैं। इस वक्त भी वे सक्रिय हैं, होंगे। पर राजनीति में सक्रिय होने के साथ सक्रिय दिखना भी जरूरी है। जनता में विश्वास तभी लौटता है जब नेता सीधे सामने आता है। लोग उनका पक्ष सुनना चाहते हैं। वो भी सीधा। बिना लागलपेट उन्हें स्वीकारना चाहिए प्रशासन की गलती है, मैं इस चूक की जिम्मेदारी लेता हूं। पर इस वक्त उनके मंत्री और अफसर बोल रहे हैं। जो ठीक नहीं है। गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह और महिला बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस ने पहले ही दिन ये कहकर किसानों का गुस्सा बढ़ा दिया कि पुलिस की गोली से नहीं मरे किसान। अफसर भी ऐसा ही गोलमोल करते रहे। बेहतर होता शिवराज खुद आकर ये जवाब देते। शिवराज के प्रति जो भरोसा जनता में है पिछले तीस साल में किसी नेता के प्रति नहीं रहा। महिलाओं, बेटियों व किसानों के भी बड़े वर्ग के बीच अभी भी वे चमकता चेहरा हैं। राजनीति भले कुछ भी कहती हो। वे मैदानी नेता हैं, और उन्हें वही रहना भी चाहिए। पिछले सप्ताह इंदौर नगर निगम के कार्यक्रम में पंडाल गिरने पर जो शिवराज दिखे थे, वैसे ही अभी भी दिखने चाहिए। निश्चित ही एक चूक ने उनकी राजनीति और प्रशासन दोनों पर सवाल लगा दिया। इन सवालों के जवाब वक्त नहीं शिवराज सिंह को खुद ही देने होंगे।
पुलिस फायरिंग में 6 किसानों की मौत के बाद मंदसौर में पुलिस अधीक्षक और प्रशासनिक तबादले किए गए। पर बड़ा मुद्दा ये है कि क्या सिर्फ एक-दो तबादले पूरी व्यवस्था को दुरुस्त कर देंगे? जांच होनी चाहिए कि आखिर किसके आदेश पर गोली चली और क्यों? आखिर शिवराज के करीबी अफसर इतने बड़े आंदोलन के खतरे को पढ़ क्यों नहीं सके? सीधी बात है अफसरों की मंडली फीलगुड में जी रही है। ये मंडली मुख्यमंत्री को भी वही दिखा रही है, जो बंद कमरों से वो देख रही है। सरकार के शीर्ष में अभी जो अफसर हैं, उनमें से आधे से ज्यादा वही हैं, जो दिग्विजय के कार्यकाल में भी कुछ ऐसी ही जिम्मेदारी पर थे। दिग्विजय को भी ये ऐसी ही रिपोर्ट देते रहे, कही कोई गुस्सा नहीं, सब खुश हैं। बिजली कटौती, शहरी लोगों के वोट नहीं चाहिए, सवर्णो के वोट की मुझे जरूरत नहीं जैसे बेतुके दिग्विजय के बयानों को भी अफसरों ने बहुत खूब, ‘राजा साहब’ कहकर कसीदे कढ़े। इन दरबारी अफसरों ने ही कांग्रेस की सत्ता का नाश किया। यदि ये वक्त रहते दिग्विजय को जमीनी हकीकत बताते तो शायद कुछ हालात सुधरते। शिवराज और दिग्विजय के कार्यकाल की कोई तुलना नहीं। ऐसे दरबारी अफसरों के कारण ही किसानों की असली परेशानी सामने नहीं आ सकी। आंदोलन की उग्रता ये साबित करती है कि आग लंबे समय से धधक रही है। अभी भी वक्त है, ऐसे अफसरों को हटाकर नए चेहरे लाए जाएं। इतिहास गवाह है कि अफसरों की गलती ने हमेशा राजनेताओं और सरकारों को खत्म किया है। अफसर भी ये जानते हैं कि आज तबादला, कल वापसी तय है। शिवराज सिंह को अपनी कार्यशैली और आक्रामक करनी ही होगी, उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सीखना चाहिए। नीतीश कुमार ने अफसरों और मंत्रियों पर भरोसा किया पर पूरा भरोसा कभी नहीं किया। कई स्तरों पर अफसरों की भी ट्रैकिंग नीतीश कुमार करते रहते हैं। यही सफलता का फार्मूला है।
इस आंदोलन से एक और बात सामने आई कि संघ से जुड़े किसान संगठन और बीजेपी का अपना नेटवर्क कहां गुम हो गया। इसकी भूमिका भी कमजोर रही। बीजेपी का संगठन, विधायक और वरिष्ठ नेता भी खामोश रहे। आंदोलन के आठ दिन में किसी भी बीजेपी के विधायक या वरिष्ठ नेता ने अपने इलाके के किसानों को समझाने की कोशिश तक नहीं की। कहीं ऐसा कुछ सामने नहीं आया। क्या मंत्रियों ने अपने इलाकों में कोई कोशिश की? नहीं। क्यों? इसका भी जवाब तलाशा जाना चाहिए। बीजेपी जैसी संगठनात्मक पार्टी के लिए ये भी एक चेतावनी है। क्या बीजेपी भी कांग्रेस बनती जा रही है। खैर, इस सबके बावजूद आज भी निर्विवाद रूप से शिवराज प्रदेश के सबसे पसंदीदा नेता हैं। उनके चेहरे और कामों की चमक इस मामले से धुंधली जरूर हुई है। पर वे इस धुंध को हटा सकते हैं पर अपनी सच्चाई से। शिवराज को चाहिए कि दरबारी अफसरों और जमीनी हकीकत से कट चुके मंत्रियों के भरोसे रहने, उनकी सलाह मानने के बजाय खुद पूरे प्रदेश में किसानों की चौपाल लगाएं। एक-एक इलाके में जाएं और किसानों को समझाएं, उनसे पूछे-क्या दिक्कत हैं। मुख्यमंत्री को 51 जिलों में 51 चौपाल करनी चाहिए। साथ में कृषि मंत्री, संबंधित विभागों के अफसरों के सामने किसानों से खुलकर चर्चा करनी चाहिए। संभव है, ये चौपाल दस से बारह घंटे तक चले। पर शिवराज एक किसान के बेटे हैं और दस बारह-घंटे उन्हें थकाएंगे नहीं इस बात का भरोसा तो किया ही जा सकता है। ये कठिन जरूर है पर करना ही होगा, और दोषियों को तत्काल सजा भी सुनानी होगी। ये चौपाल और लोगों से सीधा संपर्क शिवराज को अन्नदाता के सामने नायक साबित करेगा। वे इस प्रदेश के कभी न भुलाने वाले नायक बन जाएंगे। वरना, जनता को भूलते देर भी नहीं लगेगी। रामायण के सुंदरकांड में कहा गया है -
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास
Sunday, June 4, 2017
पौरुषविहीन प्रशासनिक, पुलिस व्यवस्था,जनप्रतिनिधि भी निकम्मे और बेशर्म
पिछले तीन दिनों से पूरा इंदौर शहर बंधक है। किसानों (शहरी) प्रशासन और राजनेताओं के सौजन्य से हमारी जिंदगी पर खुलेआम प्रहार हो रहा है। जिंदा रहने की आजादी तक खतरे में दिख रही है। तीन दिनों में किसानों का प्रदर्शन और जनता की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। लोग दूध और सब्जी के लिए मारे-मारे घूम रहे हैं। महिलाओं के हाथ से सब्जी लूटी जा रही है। औरतों, बच्चों के दोपहिया वाहन तक रुकवाकर उनकी चेकिंग की जा रही है। एक तरह से जिस आदमी के भी हाथ में दूध और सब्जी दिख जाए उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। ये सब हो रहा है, पुलिस और प्रशासन के सामने। पर कहीं किसी स्तर पर चिंता, बेचैनी या इन उपद्रवियों से निपटने का कोई इंतजाम नहीं दिखता। पहले ही दिन से पूरे आंदोलन को बेहद हलके में लिया। प्रशासन इसकी गंभीरता पढ़ने में विफल रहा। इसका नतीजा, शनिवार रात किसान हिंसक हो गए। रानीपुरा हादसा, निगमकर्मी की हत्या या किसान आंदोलन, शासन की ऐसी चूक का भुगतान कब तक आम आदमी करेगा, और क्यों? आखिर कोई इसकी जिम्मेदारी लेगा। जवाब देगा?
ऐसा नहीं है कि सब कुछ अचानक हुआ। पहले ही दिन से उग्रता दिखाई दे गई थी। लोग देर रात तक दूध की दुकानों पर कतार लगाते दिखे। कई बच्चे दूध को तरस गए, मरीज परेशान हैं। पर अफसरों ने कागजों पर जमकर सबकुछ ठीक होने का भ्रम पैदा किया। जैसे- हालात सुधर रहे हैं, कल से आपूर्ति सामान्य, उज्जैन से दूध आएगा, साँची करेगा पूरी व्यवस्था, प्रशासन की निगरानी में बंटेगा कई हजार लीटर दूध। पर हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसी अफसर ने आखिर इसे मैदानी तौर पर जांचने की जहमत क्यों नहीं उठाई। क्या कोई अफसर है जो सामने आकर ये कह सके -मैंने पूरा शहर घूमा। शायद कोई भी अफसर ऐसा नहीं कह सकेगा। यदि अफसर मैदान में उतरता है तो उसका असर निचले स्तर तक दिखता है। उपर से यदि कोई प्रशासनिक विफलता पर सवाल उठा दे, तो अफसर बिफर पड़ते हैं, उनका जवाब होता है- आप ही संभाल लीजिए।
नए दौर में स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, आॅनलाइन व्यवस्था, थंब सिस्टम और अवार्ड बटोरने के लिए बनती योजनाओं के लिए ही अफसर खड़े दिखते हैं। मंत्रियों के आगमन के अलावा अफसरों को कभी शहर को समझते नहीं देखा। आखिर आम आदमी से इतना दूर क्यों है अफसर ? आखिर क्यों नहीं पुलिस साये में दूध बंटवाने जैसे कोई व्यवस्था की गई। इस मुद्दे पर पुलिस और प्रशासन की बीच कोई ठोस संयुक्त मीटिंग भी नहीं हुई। एक बार फिर ये बात सामने आई कि पुलिस और प्रशासन के बीच तालमेल नहीं है। दो शीर्ष अफसरों की आपसी खींचतान भी बीजलपुर में शनिवार रात सामने आई। इसी खींचतान का नतीजा ये रहा कि पुलिस तीन घंटे बाद उपद्रवियों को खदेड़ पाई।
दरअसल, किसानों के नाम पर ये राजनीति का खेल है। प्रदर्शन करने वाले सिर्फ एक इलाके विशेष से हैं। हिंसा करने वालों में किसान कितने हैं, ये भी जांच का विषय है। किसानों की मांग जायज है, पर उसको मनवाने का तरीका बेहद गलत है। किसी भी जनप्रतिनिधि को ये हक नहीं कि प्रदेश भर में अपनी राजनीति को चमकाने के लिए वो किसानों की आड़ में ऐसा हिंसक और जनता को दर्द देने वाला खेल खेले। बड़ा नेता बनने की चाह अच्छी है, रहनी भी चाहिए पर जनता की कीमत पर नहीं। इसके आंदोलन की आड़ में एक सुनियोजित राजनीतिक समीकरण है ये इसकी उग्रता से साबित होता है। आखिर प्रदर्शन करने वाले किसान सुतली बम और पटाखे लेकर क्यों आये थे? आखिर रहवासी इलाकों में लोगों के घरों में बम कोई किसान तो नहीं ही फेंकेगा।
शहर में हर कोई जानता है, ये सुतली बम, पटाखे और मिट्टी वाले अनार किस विधानसभा क्षेत्र में बनते, बिकते हैं। जरूरत है, इन पटाखों को सुलगाने वाले राजनेताओं के पहचानने की। क्या वोट और अपना कद बढ़ाने के लिए इस हद तक नीचे गिर जाएंगे हम। इस मामले में शहर के सभी जनप्रतिनिधियों की बेशर्मी और निकम्मापन भी उजागर हुआ। कश्मीर, गाय, प्रियंका चोपड़ा की ड्रेस जैसे मुद्दे पर भी मैदान संभालने वाले हमारे विधायक, पार्षद, राजनेता तक इस मुद्दे पर सामने नहीं आए। शराब दुकानों की
तोड़फोड़ पर शराब माफिया के पक्ष में खड़े होने वाले और शराब का वितरण ठीक से हो सके इसके लिए पुलिस की सुरक्षा दिलवाने से लेकर अपने पटठों की फौज लगवाने वाले दूध के वितरण के लिए क्यों सामने नहीं आये। किसी भी विधायक या पार्षद ने अपने इलाके में दूध और सब्जी के सुरक्षित वितरण के लिए न पुलिस मदद मांगी न खुद कुछ किया। अफसरों को छोड़िये, आखिर राजनेता किस मुँह से जनता के बीच घूमते हैं, उन्हें शर्म नहीं आती अपने नाकारापन पर। वक्त है राजनीति के इस खेल में दूध का दूध और पानी का पानी करने का।
आखिर इस आंदोलन से किसे क्या मिला ? किसानों को तो निश्चित ही कुछ नहीं मिला, मिलने की कोई संभावना भी नहीं। हकीकत ये है कि गांव में बड़ा वर्ग परेशान है, आखिर रोज इतना दूध वो कहां संभाले। एक करोड़ से ज्यादा के फल और सब्जी मंडी में सड़ गए है। कई हजार लीटर दूध बर्बाद हो चुका है। ट्रकों में भी फल और सब्जियां बर्बाद हो रही है। बच्चे दूध को तरस रहे हैं। आखिर इस तरह की त्रस्तता आम आदमी कब तक झेलेगा।
रामधारी सिंह दिनकर ने शायद जनता को जगाने के लिए ही ये पंक्तियाँ लिखी होगी--
आज घना अंधकार तेरे पौरुष को चुनौती दे रहा है। नींद से जाग! आलस्य को झाड़ कर उठ खड़ा हो!
वक्त है, इस पौरुषविहीन व्यवस्था को बदलने का।
Thursday, May 25, 2017
तीर्थयात्रा से लौटकर सीधे अंतिम यात्रा !!! ऐसी त्रासदी !!!
अपनों को तीर्थयात्रा पर विदा करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है. परिवार उम्मीद करता है कि तीर्थयात्रा से लौटकर माता-पिता किस्से सुनाएंगे, गंगाजल के साथ आशीर्वाद भी लाएंगे. पर 23 तारीख को एक झटके ने मध्यप्रदेश के बेटमा तहसील को हिला दिया. उत्तरकाशी के सड़क हादसे में करीब 22 लोगों की मौत हो गई, इस हादसे की सुचना ने इलाके को सदमे, दर्द और इंतज़ार में बदल दिया. जिनसे ज़िंदगी मिली उनके शवों को देखना कितना त्रासद है. तीर्थयात्रा से लौटकर सीधे अंतिम यात्रा !!! ऐसी त्रासदी !!!
Sunday, May 21, 2017
Sunday, April 23, 2017
ये मुख्यमंत्री नहीं, शिवराज के भीतर के कार्यकर्ता की आवाज़
शिवराज सिंह चौहान. काम ज्यादा, बोल कम. चेतावनी, धमकी,नसीहत. ये शब्द शिवराज के शब्दकोश में नहीं हैं. पर मोहनखेड़ा से कुछ अलग निकला. यहाँ मुख्यमंत्री ने अपने सुर बदले. बदलाव भी एक दम यू टर्न जैसा. बीजेपी कार्यसमिति की बैठक में शिवराज ने चेतावनी दी. वो भी अपने मंत्रियों को. सीधे-सीधे वे बोले-जो मंत्री संगठन की बैठक में नहीं आ सकते, वे इस्तीफा दे दें. अफसरों तक को कभी चेतावनी न देने वाले का ये अंदाज़ बड़ा सन्देश है. इसके दो मायने हैं. पहला-संगठन को सत्ता से उपर स्थापित करना. दूसरा-मंत्रियों और बड़े नेताओं को चुनाव के पहले उनकी जमीन दिखाना. दरअसल बीजेपी की सत्ता तो मजबूत हुई, पर संगठन लगातार कमजोर हो रहा है. पूरे प्रदेश में कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का मामला उठता रहा है. बीजेपी पिछले चौदह साल से सत्ता में है. इन चौदह सालों में साल दर साल कार्यकर्ता कमजोर होता गया. पार्टी कुछ छत्रपों में बंट कर रह गई. बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो रहा है. कांग्रेसीकरण यानी सत्ता और संगठन में दूरी. कांग्रेस के मंत्रियों में भी गुरुरु था कि वे अपने दम पर हैं,वे और उनके आसपास की "जी हुजूर" मंडली ही संगठन है. बीजेपी पर चूंकि संघ का सेंसर लगा हुआ हैइसलिए कोई मंडली उसपर कब्ज़ा नहीं कर पाई. फिर शिवराज को ऐसा क्यों कहना पड़ा? साफ है, मोहनखेड़ा में कई बड़े नेता और मंत्री नहीं पहुंचे. जो पहुंचे वे भी पूरे दो दिन नहीं रुके. कुछ तो सिर्फ मुँहदिखाई की रस्म करके लौट गए. इसमें से तीन चार तो ऐसे हैं जो सिर्फ कुछ घंटे के लिए आये. किसी भी मंत्री, बड़े नेता के पास संगठन के लिए 48 घंटे की फुर्सत नहीं हो इसे क्या कहा जाएगा. वाकई मंत्रियों और बड़े नेताओं का ये रवैया खतरे की घंटी है. शिवराज चूंकि संगठन की तगड़ी समझ वाले नेता है, उनमे मुख्यमंत्री होने के बावजूद बीजेपी का कार्यकर्ता वाला भाव जिन्दा है. इसीलिए वे इस खतरे घंटी की आवाज़ सुन सके. शिवराज ने ये तक कहा कि जब राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में पूरे समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मौजूद रह सकते हैं, तो आप लोग क्यों नहीं. मोहनखेड़ा में "शिवराज बोलते नहीं" की आम धारणा टूटी. मोहनखेड़ा बीजेपी की संगठन की राजनीति में बदलाव की शुरवात
साबित होगा.
Thursday, April 13, 2017
अंबेडकर के प्रति पूर्वाग्रह रखते थे गांधी, दोनों की पहली मुलाकात भी थी बेहद तल्ख!
14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती है। इंदौर के पास महू बाबा साहेब की जन्मभूमि है। यहां कई आयोजन होंगे। महात्मा गांधी और अंबेडकर दोनों ही छुआछूत के खिलाफ अभियान चला रहे थे। अंतर सिर्फ इतना था कि गांधी सवर्ण थे, और अंबेडकर दलित समुदाय से। दोनों में कई समानता भी रही, जैसे विदेश में पढाई, कानून के जानकार, दोनों का लक्ष्य आम आदमी तक पहुंचना। अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज बुलंद करना। इतनी समानता के बाद भी महात्मा गांधी और बाबा साहेब अंबेडकर के बीच रिश्ते बेहद तल्ख़ रूप में जाने जाते हैं। बहुत सारे लेख, किताबें और इतिहासकार भी यही दर्शाते हैं कि गांधी और बाबा साहेब की पटरी नहीं बैठती थी। दोनों के बीच पहली मुलाकात भी बेहद तल्ख रही। हालांकि वक्त के साथ रिश्तों में सुधार हुआ। पर दोनों के बीच कभी बेहद निकटता या भावनात्मकता वाले प्रमाण नहीं मिलते। तमाम साहित्यकारों ने ये बताने की कोशिश की है कि दोनों एक दूसरे के निकट थे। ये बहुत हद तक गले नहीं उतरता। गांधी ने अपने जीवनकाल में बहुत कुछ लिखा। उन्होंने सरदार वल्लभ भाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस यहां तक की जिन्ना के बारे में भी विस्तार से कई जगह जिक्र किया है, पर बाबा साहेब को लेकर ऐसा कुछ गांधी ने नहीं लिखा. क्यों? शायद गांधी अपने प्रतिस्पर्धी के तौर पर देखते थे बाबा साहेब को. संभव है, गांधी के मन में ये भाव रहा हो कि ये युवक कैसे दलितों के खासकर छुआछूत के मुद्दे को इतनी बेबाकी से उठा सकता है। इसका कारण, गांधी अस्पृश्यता को पूरी तरह अपना मौलिक विचार मानते रहे होंगे। एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है है कि गांधी को बाबा साहेब पर भरोसा न रहा हो। बाबा साहेब की विदेशों से ली गई डिग्री और सूट-बूट वाली छवि गांधी को ये मानने से रोकती होगी कि एक विदेशी विचार वाला व्यक्ति कैसे दलितों के मुद्दे पर लड़ाई लड़ सकेगा। महात्मा और बाबा साहेब के बीच करीब 20 सालों के सम्बन्ध रहे, सार्वजनिक रूप से सीधे-सीधे दोनों के बीच के मतभेद सामने आते रहे। कुछ राजनीति शास्त्रियों का मानना है कि दोनों की बीच मतभेद रहे पर मनभेद नहीं रहा, पर रिश्ते बहुत भावनात्मक भी नहीं रहे। दरअसल तमाम अध्ययन का सार ये निकलता है कि गांधी अंबेडकर को लेकर पूर्वाग्रह से भरे हुए थे। गांधी के मन में ये बात गहरे बैठी हुई थी कि अंबेडकर ने विदेश से डिग्री हासिल की है। वे अंबेडकर को सूट-बूट वाला एक यूरोपियन स्टाइल का युवा मानते थे। उन्हें लगता था कि अंबेडकर एक उतावले सवर्ण समुदाय के युवा हैं, जो बदलाव के लिए बेताब है। गांधी संभवतः दो बातों को लेकर भ्र्म के शिकार हुए। पहला-उन्हें लम्बे समय तक ये भ्रम रहा कि अंबेडकर सवर्ण समुदाय से हैं। दूसरा उन्हें लगता था कि अंबेडकर विदेशी नजरिए से हिंदुस्तान देख रहे हैं, उन्हें देश की जयादा जानकारी नहीं है। ये दो कारण ही गांधी के अंबेडकर के प्रति पूर्वाग्रह के कारण बने। यही कारन रहा कि सरल और सहज व्यवहार वाले गांधी ने पहली मुलाकात में बाबा साहेब से बड़े तीखे अंदाज़ में और लगभग उनके विचार को अस्वीकार करते हुए बात की। गांधी ने अंबेडकर को यहां तक कह दिया था कि-डॉक्टर आप पैदा भी नहीं हुए थे तब से मैं अछूत आंदोलन से जुड़ा हूं। डॉक्टर कहकर भी गाँधी ने एक तरह से अंबेडकर पर तंज़ ही कसा था।
14 अगस्त, 1931 को दोनों की पहली मुलाक़ात बंबई के मणि भवन में हुई, गांधी मुंह से पहला ही वाक्य निकला- ह्यतो डॉक्टर, आपको इस बारे में क्या कहना है? महात्मा गांधी जैसे अनुभवी और उम्रदराज व्यक्ति के तीखे तंज का अंबेडकर जैसे युवा का जवाब भी तंज के साथ ही था- आपने यहां मुझे आपकी अपनी बात सुनने के लिए बुलाया था। कृपा करके वह कहिए जो आपको कहना है। या आप चाहें तो मुझसे कोई सवाल पूछें और फिर मै जवाब दूंगा। गांधी का स्वर भी तीखा हो गया, वे बोले- मैं समझता हूं कि आपको मेरे और कांग्रेस के खिलाफ कुछ शिकायते हैं। आपको बताऊं कि अपने स्कूल के दिनों से ही मैं अस्पृश्यों की समस्या बारे में सोचता रहा हूं। तब तो आपका जन्म भी नहीं हुआ था। यह आश्चर्य की बात है कि आप जैसे लोग मेरा और कांग्रेस का विरोध करते हैं। यदि आपको अपने रुख को साबित करने के लिए कुछ कहना है तो खुलकर कहिए। जवाब में डॉ अंबेडकर की बातों में भी व्यंग्य था। उन्होंने कहा- महात्माजी, यह सच है कि जब आपने अछूतों की समस्या के बारे में सोचना शुरू किया तब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। सभी बूढ़े और बुजुर्ग लोग हमेशा अपनी उम्र की दुहाई देते हैं। यह भी सत्य है कि आपके कारण ही कांग्रेस ने इस समस्या को मान्यता दी। लेकिन मैं आपसे कहूंगा कि कांग्रेस ने इस समस्या को औपचारिक मान्यता देने के अलावा कुछ भी नहीं किया. आप कहते हैं कि कांग्रेस ने अछूतों के उत्थान पर बीस लाख रुपये खर्च किए। मैं कहता हूं कि ये सब बेकार गए। इतने सबसे तो मैं अपने लोगों के विचारों में में आश्चर्यजनक परिवर्तन ला सकता था। लेकिन इसके लिए आपको मुझसे बहुत पहले मिलना चाहिए था। देश को आज़ादी दिलाने वाले और देश को संविधान देने वाले हिंदुस्तान के दो नेताओं की मुलाकात पर अभी और गंभीर शोध की जरुरत है। निश्चित रूप से गाँधी और अंबेडकर के रिश्तों की पड़ताल देश में सवर्ण और दलित रिश्तों पर नये ढंग से रोशनी डालेगा।
Wednesday, March 1, 2017
आखिर बोलना क्यों हिंदुस्तान में अब बड़ा गुनाह है, क्यों हमें किसी से डरना चाहिए!
गुरमोहर एक नाम. एक लड़की. एक मिसाल. एक साहस. एक तमाचा. एक उम्मीद. एक खतरा. भविष्य की दिशा. उम्मीद इस मायने में कि शायद गुरमोहर के सवाल से देश की सत्ता और उसके भक्त थोड़ा सुधरेंगे. खतरा ये (जिसकी आशंका ज्यादा है) कि कही सबकी जुबान बंद करने का अभियान न चल जाये. अभी भी ये चल ही रहा है. पर संभव है देश इसे एक कानून के तौर पर ले ले. सरकारें तय कर दें कि आपकी आज़ादी की सीमा क्या है. नोटबंदी की तरह जुबानबंदी और शब्दों का एक नया कोष आ सकता है, जिसमे साफ़ हो कि इसके बाहर बोले तो आपकी आज़ादी के संवैधानिक कार्ड पर भी एटीएम कार्ड की तरह ट्रांजेक्शन सीमा लगा दी जाये. क्या ये लिखना कि -मैं एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्) से नहीं डरती, गुनाह है. आखिर किसी को क्यों किसी से डरना चाहिए. आखिर ऐसी नौबत क्यों आये की गुरमोहर को लिखना पड़े-मैं एबीवीपी से नहीं डरती. इसमें डराने वाला गुनाहगार है, या डरनेवाला या ये कहना वाला कि मैं नहीं डरता. पहला डरानेवाला यानी छात्र संगठन वो पूरी तरह मुक्त है, डरनेवाले तो बेचारे वैसे ही खामोश है. अब तीसरा पक्ष यानी गुरमोहर जिसने कहा मैं नहीं डरती, ही इस मामले में पूरी तरह से गुनाहगार बतायी गई. क्यों ? क्योंकि उसने कहा मैं डरती नहीं. आखिर पिछले कुछ सालों में डराना एक देशभक्ति और डर के खिलाफ जाना देशद्रोही कैसे हो गया? आखिर इतना बदलाव कैसे आया कि हम बड़े आंदोलन तो ठीक, किसी एक व्यक्ति का बोलना भी पसंद नहीं कर रहे. सोशल मीडिया पर जो बोले उसके मूँह पर पट्टी बांधते लोग घूम रहे हैं. क्या ये देश एक-एक आदमी की जुबान बंद करने में लगा है. सरकारों को भी शायद ये गुंडई पसंद है, तभी तो वित्त मंत्री अरुण जेटली आज़ादी को फिर से परिभाषित करने की बात करते हैं और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजुजू कहते हैं कि उस लड़की का दिमाग कोई पॉल्यूटेड कर रहा है. आखिर बिना किसी जांच के मंत्री इस कदर एक लड़की के खिलाफ कैसे खड़ा हो सकता है. इसका मतलब यह माना जाये कि एबीवीपी की हिंसा और उसका डराने का समर्थन सरकार करती है. साथ ही छुपे रूप में क्या मंत्रीजी ये कह रहे हैं कि-एबीवीपी से डरना जरुरी है.
आखिर दिल्ली के रामजस कॉलेज में एबीवीपी की हिंसा के खिलाफ एक लड़की के खिलाफ इतना बड़ा हमला क्यों. क्यों नहीं कैंपस की ये मांग वही पर सुलझा ली गई. उस लड़की का ये कहना कि-मैं नहीं डरती इतना चुभा कि उससे बदला लेने को उतारू हो गए. यदि बदला लेने की कोई इच्छा नहीं थी तो क्यों 28 अप्रैल 2016 का एक पुराना विडियो ढूंढकर निकाला गया. 36 पोस्टर वाले इस वीडियो में से सिर्फ 13वे नंबर का वीडियो निकालकर उसे देशद्रोही बता दिया गया. क्या कहा गुरमोहर ने इसमें. सिर्फ यही ना कि मेरे पिता कारगिल युद्ध में शहीद हो गये. तब में सिर्फ दो बरस की थी. मेरी पूरी ज़िन्दगी इस बात में गुजरी की पाकिस्तान ने मेरे पिता को मारा. पर अब में समझ रही हूं पाकिस्तान ने नहीं युद्ध की सोच ने मेरे पिता की जान ली. आखिर ये कैसे देशद्रोह है. क्या शान्ति की बातें करना देश द्रोह है. यदि ऐसा है तो पाकिस्तान प्रमुख नवाज़ शरीफ को गले लगाने वाले, उनकी मां को शॉल भेजने वाले और अचानक विमान का रास्ता मोड़कर नवाज़ की बेटी की शादी में शामिल होने वाले हमारे प्रधानमंत्री तो सबसे बड़े देशद्रोही हुए. ? उन्होंने सबसे बड़ी पहल जी जंग की खिलाफ. ऐसे में क्या ये देशभक्तों की टोली उन्हें भी ट्रोल करके धमकी देगी. जाहिर है नहीं? फिर देशभक्ति कैसे तय होगी? आदमी से? उसके पद से? रुतबे से? शिक्षा से ? राजनीतिक धारा से? ऐसा होना नहीं चाहिए, पर हो ये ही रहा है. गुरमोहर और उसके जैसे आम आदमी की आवाज़ देशद्रोह और वही बात हम कहें तो देशप्रेम. आखिर कहां जा रही है इन युवाओं की दिशा- भारत मां का अपमान नहीं सहने वाले युवा सरेआम "मां" की गाली दे रहे हैं. नारी तुम श्रद्धा हो, सम्मान हो का नारा बुलंद करने वाले अपने ही देश की बेटी को सरेआम जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, उसे बलात्कार की चेतावनी दे रहे हैं. इस चेतावनी के बाद जब गुरमोहर ने आंदोलन छोड़कर घर लौटने का फैसला लिया तो इसे जीत मानकर जश्न मनाने वालों को क्या कहें? ये जीत नहीं ये एक चिंगारी है जो गुरमोहर ने दी है. यदि सरकारों से जनता पूरी तरह खुश होती और गुरमोहर को गलत मानती तो पूरे देश में इतने बड़े पैमाने पर लोग उसके पक्ष में सामने न आते. उम्मीद करें कि सत्ता इससे सबक लेगी. वरना एक दिन ये भक्तों की ट्रॉलिंग का नतीजा नेताओं की जुबानबंदी करवा देगा.
Friday, February 17, 2017
थकी हुई कांग्रेस को उबार सकेंगे 70 साल के कमलनाथ !
दस साल के "दिग्विजय" कार्यकाल के बाद सबकुछ लुटा चुकी कांग्रेस में अब भी कुछ नहीं बदला. मध्यप्रदेश में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह रहे. उनके कार्यकाल में खिंचा अंधेरा और टूटी सड़कों ने कांग्रेस को अंधकार में धकेला और सत्ता के सारे रास्ते बंद कर दिये। 17 साल से सत्ता से बाहर कांग्रेस अब भी वही खड़ी दिखती है, जहां दिग्विजय उसे छोड़ गये थे. कुछ नहीं बदला, बल्कि पार्टी लगातार कमजोर ही दिख रही है. मिस्टर बंटाढार का तमगा बीजेपी ने दिग्विजय को दिया, और आज भी जनता इसे भूली नहीं. कांग्रेस ने भी इस नाम को बदलने की कोशिश नहीं की. मध्यप्रदेश ही एक ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस थोड़े से प्रयास से सत्ता में लौट सकती है. ये एक ऐसा राज्य है, जहां सिर्फ दो राजनीतिक दल है, बीजेपी और कांग्रेस. ऐसा नहीं है कि बीजेपी ने पिछले 17 सालों में कोई चूक नहीं की. व्यापम, खनन घोटाला, डंपर काण्ड जैसे कई मामले आये. इस दौरान तीन मुख्यमंत्री भी बदले. पहले उमा भारती प्रचंड बहुमत से बीजेपी को जीताकर लाई, पर वे मुख्यमंत्री पद से हटा दी गईं. इसके बाद बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने और फिर उन्हें भी पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाया। शिवराज सिंह चौहान जरूर पिछले ग्यारह सालों से जमे हुए हैं. बीजेपी के अपने नेता भी पार्टी के खिलाफ रहे हैं,कैलाश विजयवर्गीय, बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, उमा भारती,प्रहलाद पटेल पार्टी के खिलाफ बोलते रहे हैं. बावजूद इसके कांग्रेस प्रदेश में कोई जगह नहीं बना पाई. क्यों ? क्या कांग्रेस मध्यप्रदेश में खत्म हो चुकी है? क्या कांग्रेस के पास नया नेतृत्व नहीं है? क्या दिल्ली में बैठा आलाकमान मध्यप्रदेश कांग्रेस को लेकर गंभीर नहीं है? या कांग्रेस ने मान लिया की इस प्रदेश में वापस लौटना नामुमकिन है.
pradesh में सत्ता में लौटने के पर्याप्त मौके होने के बावजूद कांग्रेस कुछ करती नहीं दिखती. कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष अरुण यादव एक विधायक से ज्यादा कोई वजूद नहीं दिखा सके. वे संगठन तक नहीं खड़ा कर सके. अब कांग्रेस 70 साल के कमलनाथ पर दांव लगा रही है. कमलनाथ बड़े नेता जरूर है, पर मध्यप्रदेश में सिर्फ महाकौशल तक सीमित हैं. यदि प्रदेश की आम जनता जिसका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है तो वे कमलनाथ की फोटो तक नहीं पहचान सकेंगे. एक सीमित इलाके के नेता और बढ़ती उम्र वाले कमलनाथ क्या टूट चुकी थकी कांग्रेस को खड़ा कर पायेंगे। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कांतिलाल भूरिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया को आजमा चुकी है. हालांकि सिंधिया सिर्फ हेलकॉप्टर राजनीति करते रहे कभी उनका जुड़ाव भोपाल या राजनीतिक गलियारों में नहीं रहा. कांतिलाल भूरिया जमीन से जुड़े मेहनती नेता रहे, पर आलाकमान के सामने वे अपनी बात नहीं रख सके. आज फिर चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस कमलनाथ के नाम के साथ खड़ी है. हर कोई ये जानता है कि कमलनाथ का नाम आना चुनाव के पहले ही घुटने टेकने जैसा है. आखिर क्यों कांग्रेस एक 70 साल के आदमी के पीछे छुपना चाहती है. राहुल गाँधी एक तरफ अखिलेश से हाथ मिलाते हैं, दूसरी तरफ थके हुए चेहरों पर दांव खेल रहे हैं क्यों ? सिर्फ छिंदवाड़ा तक सीमित रहे कमलनाथ खुद भी भीतर से प्रदेश के राजनीति में आने को कभी उत्सुक नहीं दिखे. फिर क्या वे अनमने ढंग से जबरिया ये जिम्मेदारी ले रहे हैं , यदि ऐसा है तो ये और भी खतरनाक होगा. कांगेस आलाकमान को चाहिए की प्रदेश के चुनावी परिदृश्य से दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और बाकि भी 65 प्लस के नेताओं को किनारे करे. नए चेहरों को फ्री हैण्ड दें. पर नया चेहरा भी अरुण यादव जैसा पुराना न हो. यादव युवा जरूर हैं, पर उनमे न जोश है न कुछ कर दिखाने का साहस. अब भोपाल के श्यामला हिल्स में कमलनाथ का बंगला तैयार हो रहा है. कहा जा रहा है कि अब वे भोपाल में ज्यादा वक्त देंगे. अच्छा है. कमलनाथ नेता और व्यक्ति दोनों अच्छे हैं अपर उन्होंने बड़ी देर कर दी भोपाल आते-आते. ये बंगाल मुख्यमंत्री निवास के नजदीक है. ये बंगला उन्हें दिग्विजय जब मुख्यमंत्री थे तब अलॉट हुआ था. पर इसमें कमलनाथ कम ही रहे. कमलनाथ ने भी संकेत दिए हैं कि वे भोपाल पर अब ध्यान केंद्रित करेंगे. प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होंगे. इस सक्रियता की शुरवात 22 फरवरी को विधानसभा घेराव से होगी. इस घेराव में दिग्विजयसिंह और सिंधिया भी रहेंगे. इसके बाद कमलनाथ पार्टी विधायकों को अपने बंगले पर डिनर देंगे. कांग्रेस की ये कोशिश कितना जान भर पायेगी पार्टी में और युवा कार्यकर्ताओं को कितना जोड़ सकेंगे उम्रदराज कमलनाथ ये देखना दिलचस्प होगा. आखिर कमल की सत्ता उखाड़ने के लिए कमलनाथ को बहुत मेहनत करनी होगी.
Wednesday, January 25, 2017
आखिर औरतों को सिर्फ "फेयर एंड लवली" बताकर अपनी बदसूरती क्यों दिखाते हैं नेता !
आखिर औरतों को सिर्फ "फेयर एंड लवली" बताकर
अपनी बदसूरती क्यों दिखाते हैं नेता !
पंकज मुकाती
हमेशा से औरतों को राजनीति में कमतर आंकते रहें हैं, मर्द नेता. आखिर औरतों के सियासत में उतरने से इन नेताओं में इतनी घबराहट क्यों? क्यों इतने बेचैन हो जाते हैं हमारे नेता किसी भी औरत के राजनीति में सक्रिय होने पर. ऐसा क्या है जो इन मर्दों की मर्दानगी को आहत कर देता है. आखिर क्यों ये महिलाओं को बस खूबसूरती और चेहरे की नुमाइश तक ही सीमित रखना चाहते हैं. संसद से लेकर सड़क तक सिर्फ महिलाओं पर फेयर एंड लवली बयान देकर ये क्या साबित करने की कोशिश करते हैं. क्या ये खुद के खूबसूरत ना होने की इनकी कुंठा और ईर्ष्या है, जो ये महिलाओं की खूबसूरती को लेकर बयान देकर खुद को दिमागी तौर पर काबिल बताने की कोशिश करते हैं. पर हकीकत में ये सारे मर्द ऐसे बयान देकर महिलाओं के नहीं अपनी ही मानसिक बदसूरती को उजागर करते हैं. ताज़ा मामला जनता दल यू के शरद यादव का है. यादव का कहना है कि बेटी की इज्जत से ज्यादा बड़ी है वोट की इज्जत. यहाँ तक तो ठीक है, पर शरद ऋतू की तरह हमेशा मदमस्त रहने वाले राजनीति के इस शरद ने सारी सीमायें तोड़ दी. बोले-बेटी की इज्जत जाए तो सिर्फ मोहल्ले और गांव में बदनामी होती है. जबकि वोट लूट जाये तो देश बदनाम होता है. औरतों की इज्जत को लेकर उनका ये पहला और बहुत हद तक आखिरी बयान भी नहीं होगा. औरतों की खूबसूरती पर उनके बदसूरत बोल हमेशा आते रहे हैं. बीजेपी नेता विनय कटियार ने भी प्रियंका गांधी पर ऐसे ही बचकाना बयान दिया. खुद को धर्मयुध्द के वीर और हिंदूवादी राजनीति का सबसे बड़ा नेता साबित करने में लगे रहने वाले कटियार का कहना है प्रियंका क्या है उनसे खूबसूरत कई महिलायें स्टार प्रचारक हैं. कांग्रेस महासचिव और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी एक बार अपनी ही पार्टी की नेता मीनाक्षी नटराजन को सौ टंच माल बता चुके हैं.आखिर ये भाषा क्यों ? एक तरफ महिलाओं, लड़कियों को बराबरी के हक़ की घोषणाएं, उन्हें मुफ्त शिक्षा, आरक्षण जैसी तमाम योजनायें अपने मूँह से बयान करके अपनी छाती ठोंकने वाले नेता, इन्ही आगे बढ़ती महिलाओं को देखकर छाती पीटने क्यों लगते हैं ? कथनी और करनी का ये विरोधाभास सिर्फ राजनीति में ही नहीं है, पर राजनीति में महिलाओं का रास्ता सबसे ज्यादा रोका जाता है. अटल बिहारी वाजपेयी ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दुर्गा कहा तो उन्हें अपनी ही पार्टी में सफाई देनी पड़ी. क्यों? क्या किसी महिला को अच्छे काम पर दुर्गा कहना अपराध है, जबकि वही धर्मपंथी, हिंदूवादी लोग देवी दुर्गा के नाम से अपनी शाखायें लगाते है, दुर्गा वाहिनी बनाते हैं. ये कोई एक दल या एक नेता की बीमारी नहीं है. शरद यादव ने तो संसद में भी अपना रवैया वही रखा. एक सांसद को लेकर वे बोले दक्षिण भारत की महिलाएं सांवली तो ज़रूर होती हैं, लेकिन उनका शरीर खूबसूरत होता है, उनकी त्वचा सुंदर होती है, वे नाचना भी जानती हैं. लेकिन भारत के लोग गोरी चमड़ी के आगे सरेंडर कर देते हैं. यहां तो सफेद रंगत देखकर लोग दंग रह जाते हैं। शादी के विज्ञापनों में भी लिखा रहता है, गोरी लड़की चाहिए, ये सब कहते हुए उनकी भाव भंगिमा ही उनके पूरे स्वरुप को बता रही थी. शरद यादव ने संसद में महिला आरक्षण विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि यदि ये बिल पारित हो गया तो मैं ज़हर खा लूंगा. शरद यादव ने ये भी कहा था कि इस बिल से सिर्फ़ पर कटी औरतों को फ़ायदा पहुंचेगा. स्मृति ईरानी पर वे बोले थे आप चुप रहिये- मैं जानता हूँ आप क्या हैं. इस देश ने इंदिरा गांधी, जयललिता, ममता बनर्जी, सुषमा स्वराज, चन्दा कोचर, इंदिरा नुई, बछेंद्री पाल, कल्पना चावला, जैसी मजबूत औरतों को देखा हैं. जिन्होंने मर्दों के सामने अपनी ताकत, बुद्धि का लौहा मनवाया. आखिर ये फेयर एंड लवली वाले बयानों से और जिस्म से अलग औरतों को दिमागी रूप से कब देखेंगे हमारे नेता. ऐसे ही बेतुकी बयानों के कुछ नमूने -
दिग्विजय सिहं, कांग्रेस नेता
मुझे पता है कि कौन फर्जी है. और कौन सही है. इस क्षेत्र की सांसद मिनाक्षी नटराजन सौ टंच माल है.
श्रीप्रकाश जायसवाल, कांग्रेस नेता
नई शादी का मजा ही कुछ और होता है और ये सब जानते हैं कि पुरानी बीवी मे वो मजा नहीं रहता
आजमखान,नेता समजावादी पार्टी
शाहजहां ने ताजमहल बनवाया और मायावती ने अपनी मुर्तियां लगवाई. शाहजाहां को उनके बेटे औरंगजेब ने कैद किया था. ऐसे ही मायावती को जल्दी ही कोई औरंगजेब कैद करेगा.
अभिजित मुखर्जी,नेता कांग्रेस
हर मुद्दे पर कैंडल मार्च करने का फैशन हो गया है.लड़कियां दिन में सज-धज कर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं.
कैलाश विजयवर्गिय,नेता बीजेपी
क्योंकि महिलाओं को ऐसा श्रृंगार करना चाहिए कि देखने वाले को महिला के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो. दुर्भाग्य से कभी-कभी ड्रेसअप महिलाओं का ऐसा होता है कि उत्तेजना आ जाती है और निश्चित रूप से कई बार यह भी देखने को मिलता है कि इसके कारण भी समाज के अंदर विकृति आती है
लालू प्रसाद यादव,आरजेडी
"हम बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों जितना मुलायम बना देंगे."
मख्तार अब्बास नक़वी,बीजेपी
महिलाएं लिपस्टिक और पॉवडर लगाकर हाथ में मोमबत्ती लिए पश्चिमी सभ्यता के साथ नेताओं को गाली देती हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा अलगाववादी करते हैं।
नरेन्द्र मोदी,प्रधानमंत्री
हिमाचल की चुनवी सभा में शशि थरुर की पत्नि सुनंदा पुष्कर की के बारे में कहा थी कि 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड
संजय निरुपम,नेता कांग्रेस
स्मृति ईरानी कल तक टीवी पर ठुमके लगाती थी आज चुनाव विश्लेषक बन गई हैं
Tuesday, January 17, 2017
शिवपाल यादव का हश्र, चेतावनी है तानाशाही की राजनीति करने वाले नेताओं को !
कल तक "पार्टी" मांग रहे चाचा शिवपाल आज
अपने खुद के टिकट के लायक भी नहीं रहे क्यों ?
कहावत है कि किस्मत कब बदल जाये कहा नहीं जा सकता. राजनीति में तो कई बार कुछ घंटों में ही बाज़ी पलट जाती है. राजा रंक और रंक राजा बन जाता है. उत्तरप्रदेश में कल तक समाजवादी पार्टी के मुखिया रहे चाचा शिवपाल से ज्यादा इसे कौन समझ सकेगा. दो दिन पहले तक पूरी समाजवादी पार्टी पर अपना दावा जताने वाले शिवपाल आज अपने खुद के टिकट के लिए अखिलेश के भरोसे हैं. पिछले सप्ताह तक समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रमुख बनकर पूरी 403 सीटों पर अपनी मर्जी से टिकट बांटने का अधिकार और जिद रखने वाले शिवपाल आज नितांत अकेले हैं. राजनीति में वैसे भी कोई कभी किसी का सगा नहीं। समाजवादी पार्टी में तो बेटा अपने पिता का ना हुआ. पिता से टक्कर लेने वाला चाचा को कैसे बक्श देगा? शिवपाल ने टिकट के लिए अपनी सूचि भी जारी कर दी थी और इसी सूची ने उन्हें समाजवादी पार्टी की सूची से ही बाहर कर दिया. सत्ता के साथी होते हैं, कार्यकर्त्ता, नेता और मंत्री। यदि पार्टी की लड़ाई मुलायम जीत जाते तो आज शिवपाल के घर हजारों लोगों का हुजूम होता. पर आज सबकुछ अखिलेश के पाले में हैं. वक्त रहते राजनीति की करवट को न समझना, बदलाव की इबारत को न पढ़ पाना, अपने पुराने दौर की ज़िद, घमंड और "मैं" की गुंडई शिवपाल को भारी पड़ी. ये भी सिद्ध हो गया कि शिवपाल की अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है. वे सिर्फ मुलायम सिंह यादव के आशीर्वाद और यादव कुनबे के होने के सत्ता और संगठन सुख लेते रहे. आखिर क्यों चूक गए शिवपाल जैसे चालाक राजनेता. सीधा कारण है, जनता और कार्यकर्त्ता अब धमकाने वाले, रंगदार जैसा व्यवहार करने वाले नेता को पसंद नहीं करती. जनता ही नहीं कार्यकर्त्ता भी अब बराबरी का हक़, साथ खड़े होने का सम्मान चाहता है, वो किसी के चरणों में धमक के कारण झुकने को तैयार नहीं है. अखिलेश ने उत्तरप्रदेश खासकर समाजवादी पार्टी की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा किया है. उन्होंने अपनी सूरत की तरह ही अपनी सीरत से भी लोगों में ये भरोसा पैदा किया कि यादव कुनबे का ये सपूत थोड़ा अलग है. समाजवादी पार्टी की लड़ाई, कुनबे का संघर्ष चाहे जो परिणाम दे चुनाव में, पर एक बात तय है देश में युवा शक्ति, युवा राजनीति और लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है. न कोई पार्टी किसी की खानदानी विरासत हो सकती है, न कोई कार्यकर्त्ता और जनता का अपमान करके लंबी पारी खेल सकता है. अब सम्मान और विकास की राजनीति का ही दौर है. गुमान, जिद, तानाशाही अब बीते दिनों की बात हुई.
Tuesday, January 10, 2017
राहुल करवायेंगे मोदी से शीर्षासन !
जनवेदना कार्यक्रम में राहुल गांधी ने जिस तरह से नरेंद्र मोदी पर हमला बोला वो राहुल के बदलाव को बताता है. दरअसल नोटबंदी के बाद से विपक्ष और खासकर राहुल गाँधी बहुत मुखर हुए हैं. वे लगातार मोदी पर हमला बोल रहे हैं. जनवेदना के जरिये भी वे एक तरीके से मोदी की नीतियों से जनता को हुई वेदना और दर्द को ही सामने रख रहे हैं. राहुल गाँधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री ने पद्मासन सीखा नहीं और करने लगे योग. अब गलत तरीके से योग करेंगे तो हड्डी टूटेगी ही. ये राहुल गांधी का अब तक का मोदी पर सबसे बड़ा और गंभीर हमला है. जाहिर है राहुल यह कहना चाह रहे है, की नोटबंदी के नफे, नुकसान का आकलन किये बिना मोदी ने इसे लागू कर दिया. मोदी के इस बिना पद्मासन के नोटबंदी योगा ने देश की रीढ़ तोड़ दी. उन्होंने यहाँ तक कहा कि नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत किसी की नहीं सुन रहे बस अपनी मनमानी से फैसले कर रहे हैं. मोदीजी ने अपने मर्जी के होम मेड इकोनॉमिस्ट भी तैयार कर लिए है. राहुल बोले बाबा रामदेव और संघ के लोग जब इकोनॉमिस्ट होंगे तो सोचिये क्या होगा देश की अर्थव्यवस्था का. राहुल ने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि एक अंग्रेजी अखबार के कार्यकम् में मुझे दुनिया को नोटबंदी का आईडिया देने वाला इकोनॉमिस्ट मिले और बोले मैंने मोदी को नोटबंदी जिस तरह से करने को कहा था वैसा तो उन्होंने किया ही नहीं. नोटबंदी से परेशान देश, एकजुट होता विपक्ष और राहुल गाँधी के धारदार होते हमले मोदी को बैकफुट पर ला सकते हैं. वैसे भी जनता को नोटबंदी के पहले जितना कालाधन को लेकर मोदी पर भरोसा था वो अब नहीं दिखता। जनता ये मानती थी की मोदी कालाधन बाहर लाएंगे. गरीबों को भला होगा पर ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा. राजनीतिक दलों को बेहिसाब धन जमा करवाने की छूट और बड़े उद्योगपतियों के कर्ज माफ़ी ने जनता की वेदना को बढांया है. अब नोटबंदी कालाधन बाहर लाने
और अच्छे दिन के बजाय सिर्फ कैशलेस इकोनॉमी अभियान बनकर रह गया है. राहुल का ये आक्रमण कहीं भविष्य में मोदी को " शीर्षासन" न करवा दे.
और अच्छे दिन के बजाय सिर्फ कैशलेस इकोनॉमी अभियान बनकर रह गया है. राहुल का ये आक्रमण कहीं भविष्य में मोदी को " शीर्षासन" न करवा दे.
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