Wednesday, November 30, 2016

अब मिलेगा मोदी को नोटबंदी का असली "मेहनताना"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एप के जरिये भले 90 फीसदी समर्थन हासिल कर लिया हो, पर असली फैसला अब आयेगा. देश का एक बड़ा तबका और बाज़ार दोनों का सामना अब मोदी सरकार को करना पड़ेगा. ये वो वर्ग है, जो देश की रीढ़ है, ये अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और सरकार के शास्त्र को चलाता है. बीजेपी भी इसे अपना वोट बैंक मानती है. ये है भारत का वेतनभोगी तबका. एक तारीख से वेतन बटना है. बैंकिंग से जुड़े लोगों की मानें तो बैंकों के पास अभी एक फीसदी भी कैश पूरी तरह नहीं है. ऐसे में वेतन बटना, बेहद मुश्किल होगा. अकाउंट में पैसा भले ट्रांसफर हो जायेगा, पर एटीएम से यदि मिलेगा नहीं तो जाहिर है बड़ा गुस्सा फूटेगा. सरकार के लिए बड़ी चुनोती होगा इसे काबू करना. देश की आबादी का लगभग 80 फीसदी हिस्सा वेतन पर ही निर्भर है. भले वो सरकारी कर्मचारी हो निजी उपक्रम में नौकरी करता हो, या किसी व्यापारी के यहाँ. अभी तक सरकार की खासकर मोदी की हठधर्मिता, संघ और बीजेपी के प्रचार तंत्र ने लोगों को बोलने का मौका ही नहीं दिया. जिसने भी कुछ कहने कि कोशिश की उसे देशद्रोही, कालाधनवाला का तमगा देकर एक किनारे कर दिया. देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत के अर्थशास्त्र को जमीनी तौर पर समझने वाले मनमोहनसिंह ने फैसले की कुछ कमियों \पर सवाल उठाये तो उनके सवालों के जवाब भी सरकार ने नहीं दिए. उलटे वि त्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जिनका खुद का राज कालेधन और घोटाले से भरा रहा, वो हम पर सवाल ना उठायें. जेटली और बीजेपी दोनों को समझना चाहिये कि कांग्रेस तो अपने घोटाले की सजा भुगत रही है, पर आज सत्ता में होने के नाते हर सवाल का जवाब सरकार को देना ही चाहिये. जवाब ना देना आपको सही साबित नहीं करता, जवाब न देने से फौरी तौर पर सरकार खुश हो सकती है. पर वो सवाल बने रहते हैं, वो जनता के बीच घूमते रहते हैं, और सवालों की ये यात्रा अच्छे-अच्छों का सत्ता रथ रोक चुकी है. बेहतर होता सरकार उचित तथ्यों के साथ जवाब देती और अपने पक्ष को मजबूत करती. सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं दिख रहा. न सदन में न सदन के बाहर कहीं भी सकारात्मक बहस नहीं दिख रही. खैर, अब मूल मुद्दे पर आते हैं. वेतनभोगियों के गुस्से से निपटना आसान नहीं होगा. अब तक सबसे ज्यादा परेशानी गरीब तबके या रोज खाने कमाने वाले वर्ग ने झेली है. ये वो वर्ग है जो राजनीतिक रूप से भी परिपक्व नहीं है, और जिसकी आवाज़ कोई आवाज़ नहीं बन पा ती. ये संगठित भी नहीं हैं. ख़ास बात इस वर्ग का एटीएम व बैंकिंग से कोई लेनदेन नहीं है. . लेकिन वेतनभोगियों के साथ ऐसा नहीं है. ये संगठित हैं, इनकी आवाज़ गूंज बन जाती है. ये पूरी तरह बैंकिंग से जुड़ा हुआ और एटीएम पर निर्भर वर्ग है. ख़ास या चिंता की बात ये है कि वेतनभोगी बैंकिंग से जुड़े हैं पर इनका कार्ड से खरीदी और ऑनलाइन बैंकिंग पर भरोसा नहीं है. ये कैश में उधारी में भरोसा करता है. वेतनभोगी का 90 फीसदी वर्ग मध्यम वर्ग का है. हर वेतनभोगी के साथ औसत चार लोगों की जिम्मेदारी जुडी है. इसकी परेशानी अकेले की नहीं होगी हर वेतन भोगी के साथ एक परिवार परेशान होगा. यानी अब समूह में गुस्से का सामना सरकार का करना होगा. सबसे बड़ा सामना गृहिणियों के गुस्से का करना होगा. वेतनभोगी आमतौर पर २५ तारीख से ही अगली तनख्वाह का इंतज़ार करने लगता है. उसकी दुनिया एक तारीख को मिलने वाले वेतन से दस तारीख तक ख़तम हो जाती है. फिर आगे के 15 दिन यानी 25 तारीख तक का वक्त वो सुकून से गुजारता है, फिर आगे के 5 दिन अगली तनख्वाह के इंतज़ार में. बड़ी संख्या में ये लोग महीने भर का सामान एक साथ खरीद लेते हैं. अधिकतर लोग अपनी जरुरत का सामान मोहल्ले की किराना दूकान से नगद ही खरीदते हैं. गाड़ी की किस्तें, घर का किराया, बच्चों की फीस, अपने यहाँ काम करने वालों का पैसा सबकुछ नगद ही होता है. अब बैंकों में पैसा है नहीं, एटीएम पर कतार हैं. वेतनभोगियों के बाजार में उतरने के बाद ये कतारें लंबी होगी. एटीएम और बैंकों की कतार में खड़ा हर वेतनभोगी और एटीएम से निकली सिमित पैसों की पर्ची सरकार को भारी पड़ सकती है. हर पर्ची के साथ गुस्सा और 3 वोट कम होने की आशंका है. क्योंकि वेतनभोगियों के साथ एक चैन जुडी है, परिवार, किराना दुंकानवाले, उनके यहां काम करने वाले. ये सब जब एक साथ गुस्सा होंगे तो गुस्से का गुबार कितना बड़ा होगा ये समझना ही होगा. अब सवाल ये हैं कि नोटबंदी के 25 दिनों में ये वर्ग गुस्सा क्यों नहीं हुआ. सीधी सी बात है वेतनभोगी पूरे महीने का बजट लेकर चलता है. नोटबंदी की घोषणा हुई 9 तारीख को तबतक वेतनभोगी अपने घर का महीने भर का जरुरी सामान और जरुरी काम निपटा चुका था. उसे पूरा महीना कोई बड़ी दिक्कत नहीं आई. उसे उम्मीद थी कि अगली तनख्वाह तक सब ठीक हो जायेगा पर ऐसा हुआ नहीं, न होता दिख रहा. मोदी सरकार सतर्क हो जाए इतिहास गवाह है कि वेतनभोगी का एक बड़ा वर्ग ईमानदार कौम है और जब ईमानदार को दूसरे की बेईमानी का दर्द जबरिया झेलना पड़ता है वो पूरा बदला लेता है. कई सरकारें इस वर्ग ने उलट दी है. मोदी सरकार की नोट बंदी का असली "मेहनताना" अब मिलेगा. देखना हैं सरकार इनाम पाती है या ------!

Thursday, November 24, 2016

अपने सर्वे में सर्वेसर्वा ! ॐ नमो,, नमो !

<प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार संसद से दूर हैं. पर जनता के सामने भावना से भरे प्रधानमंत्री रोज अवतरित हो रहे हैं. आखिर सारी दुनिया को सीना ठोककर,ताली बजाकर, मुट्ठी भींचकर जवाब देने वाले "जननेता" को संसद में बोलने से परहेज क्यों? जनता ने उन्हें संसद और बहुमत ने उन्हें देश की जिम्मेदारी दी है. तो संसंद में ख़ामोशी उसी बहुमत को ठेंगा दिखाना और अपने हठधर्मिता ही कही जायेगी ( हालांकि मोदी समर्थक इस हठधर्मिता को उनके व्यवहार की सबसे बड़ी खूबी मानते हैं). नोटबंदी के मुद्दे पर तो मोदी हठ के बजाय "हट धर्मिता" यानी जो भी सवाल करेगा उसे हट... हट कर रहे हैं. ताज़ा मज़ाक उन्होंने जनता के साथ किया. कुल जमा एक दिन में मोदी ने एक सर्वे नोटबंदी पर करवाया और खुद को जनता का दुलारा घोषित कर लिया. उन्होंने घोषित कर दिया की 90 प्रतिशत से ज्यादा जनता नोटबंदी के फैसले से खुश है. यानी हर तरफ नमो.. नमो के नारे और जय जय कार है. जनता के साथ इतना बड़ा मज़ाक पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया, जनता का दर्द एक तरफ मोबाइल एप पर खरीदी वाह वाही एक तरफ. आखिर इस सर्वे के जरिये प्रधानमंत्री क्या साबित करना चाहते हैं. वे विपक्ष को चिढा रहे हैं, या संसद और सांसदों को ठेंगा दिखाकर अपनी अलग संसद के बाहर बहुमत की जोर आजमाइश दिखा रहे हैं. आपके पास बहुमत हैं, जनता ने आप पर भरोसा किया. फिर ये सब ठिठोली और दो हजार के नोट जैसा प्रदर्शन क्यों ? आखिर उस सर्वे से क्या हल निकलेगा, देश का दर्द कम होगा, नॉट की अफरातफरी रुकेगी या संसद में विपक्ष चुप हो जायेगा. देश अब मोदी से जवाब मांग रहा है. देश उनकी लोकप्रियता का नहीं उनके फैसलों पर सवाल उठा रहा है. निश्चित ही आपकी प्रचार, प्रसार क्षमता कइयों से ज्यादा है, आप उसका भरपूर लाभ भी उठा रहे हैं. उसका एक कारण इस देश की राजनीती में कोई दूसरा नेता ना होना है. हमारा दुर्भाग्य है कि चुनने के लिए जो विकल्प हैं वो भी "पप्पू" सरीखे हैं. इसलिए ये मत समझये की आप निर्विवाद रूप से नेता है. आप वक्त की मजबूरी के भी नेता हैं. आपके आंसू, आपकी कड़क चाय, आपकी माताजी का लाइन में लगकर नोट बदलवाना सब देश ने देखा. समझा. पर देश की सवा अरब जनता चाहती हैं, आप नहीं रोयें बल्कि जनता की आंसू पोंछने देश के तमाम माताओं के लाइन में लगने और धूपः में गिर जाने, इलाज के लिए भटकने का हल बताएं. आपकी देशभक्ति देश ने खूब सराही पर उसके नाम पर आप जनता को दर्द नहीं दे सकते. एक बीमारी मिटाने के नाम पर आप जनता को दवा की जगह जहर नहीं दे सकते. आखिर सवा अरब की आबादी में पांच लाख लोगों ने प्रधानमंत्री के सर्वे में भाग लिया. 90 फीसदी ने फैसले को सराहा. अछि बात है. पर ये लोग हैं कौन सीधे सीधे मोदी के एप से सिर्फ बीजेपी या मोदी भक्त ही जुड़े हैं. जाहिर है वे जवाब क्या देंगे. ये जनता के नहीं मोदीजी के भक्तों के जवाब हैं. ये पेड न्यूज़ जैसा ही कुछ है. इतने प्रशंषकों में भी करीब दस फीसदी यानी ४०००० लोगों ने इस फैसले के खिलाफ वोट दिया. यानी ये भी खतरा हैं, अपने ही लोगों से इसे भी समझिये. आखिर कोई क्या जवाब देते ऐसे सवालों के - क्या आतंकवाद से लड़ना चाहिए ? क्या कालाधन ख़त्म होना चाहिए ? क्या टैक्स चोरी पर करवाई नहीं होना चाहिए ? अब बताएं इसका क्या जवाब देगा कोई भी.? आप किसी से पूछो कि आपकी माँ बुरी औरत है ? क्या वो डायन है ? आदमी क्या जवाब देगा। ऐसे पाले पोसे सर्वे का सार यही है जो पहले से तय था अपना सर्वे अपने लोग अपन ही सर्वेसर्वा ! मोदी की जय, जय, नमो की जय जय पर किसी भी प्रधानमंत्री को ऐसा सर्वे करना शोभा देता है ? क्यों नहीं कांग्रेस इस पर एक सर्वे करवाती !

Friday, November 4, 2016

नीतीश की कथनी-करनी अलग, फिर बीजेपी से जुड़ेंगे !

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक सच्चे नेता की छवि बनाये हुए हैं, पर हकीकत में वो पलटीबाज़ और मौकापरस्त हैं. ताज़ा मामला सुप्रीम कोर्ट का है. अदालत ने हिस्ट्रीशीटर, बाहुबली शहाबुद्दीन को जमानत मिलने पर नीतीश सरकार को फटकारा है. कोर्ट ने पूछा बाहुबली को जमानत मिलने तक आप नींद में थे. जाहिर है,जमानत की कार्रवाई चलने तक नीतीश सरकार चुप बैठी रही. जब जमानत मिल गई, तब नीतीश जागे। अब नीतीश कह रहे हैं, जमानत के खिलाफ उपरी अदालत में जायेंगे. ऐसा पहली बार नहीं है, जब नीतीश ने कहा कुछ, किया कुछ. नीतीश कुमार ऐसे नेता हैं, जिन्हें किसी पर भरोसा नहीं. वे सारी सियासत खुद चलाते हैं. उनके मंत्री, अफसर सिर्फ शोभा की सुपारी हैं. ऐसे, में शहाबुद्दीन की जमानत तक नीतीश को प्रक्रिया की खबर न हो संभव नहीं. बिहार में इतने घोटाले और मामले चलते रहे हैं, कि यहाँ के राजनेताओं को राजनीती से ज्यादा क़ानून की समझ होती है. आखिर लालू के ख़ास शहाबुद्दीन को जमानत मिलना क्या दर्शाता है. निश्चित तौर पर ये अदालत का फैसला है, नीतीश इसमें क्या करते? जनता दल, नीतीश ऐसा ही कहेंगे, पर सरकार ने जमानत न मिले इसके लिए क्या किया. क्या नीतीश वो दस्तावेज सार्वजनिक करेंगे? अब जवाब वही होगा सुशासन हमारी पहचान है, कोई बर्दाश्त नहीं. हमने ही शहाबुद्दीन को जेल भेजा था. पर अब ये तर्क गले नहीं उतरता क्योंकि अब नीतीश लालू के समर्थन वाली सरकार चला रहे है. राजनीती में समर्थन दो तरफ़ा ही होता है. ये पहला और आखिरी मामला नहीं है. नीतीश ने अयोध्या मामले के बाद बीजेपी की सरकार में मंत्री पद स्वीकारा। गोधरा के बाद भी मंत्री बने रहे. लालू की खिलाफत कर सत्ता की सवारी की. लालू के जंगलराज को कोसते रहे. लालू के साथ दुरी, नफरत की हद तक प्रचारित करते रहे. फिर उसी लालू के साथ सत्ता में हैं. आज लालू को बड़ा भाई बताने से नहीं थकते. नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते बिहार बाढ़ राहत कोष में भेजे रुपये लौटाए, मोदी के साथ दुरी दिखाने के लिए पटना में भोज रद्द किया. मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की बात पर बीजीपी से नाता तोडा. अब लगातार मोदी के करीब दिख रहे हैं. मोदी के साथ नाम जोड़ने पर भी खफा होने वाले नीतीश उनकी कमेटी में शामिल हो गए. बीजेपी से कोई नाता नहीं रखने का राग अलापने वाले नीतीश आज दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी समारोह के लिए बनी समिति का हिस्सा बन गए हैं. ख़ास बात यह है कि इस समिति में कांग्रेस का कोई नेता नहीं है. तो क्या नीतीश फिर बीजेपी के साथ जायेंगे.?

एक बेचारा मुख्यमंत्री ! अखिलेश के लिए मुलायम का नाम वरदान से ज्यादा आज परेशानी बन गया

उत्तरप्रदेश की चुनावी महाभारत इस समय यदुवंश की लड़ाई पर सिमटी है. सत्ता के मजबूत स्तम्भ इस यदुवंश या यादव परिवार में कलह मचा हुआ है. कुनबे के मुखिया मुलायम को जनता धृतराष्ट्र और धर्मराज युधिष्ठिर दोनों के रूप में देख रही है. कुछ उन्हें धृतराष्ट तो कुछ युधिष्ठिर मान रहे हैं. खुद मुलायम ने अभी तक पुत्र मोह से खुद को अलग दिखाया है. मुलायम ने पुत्र और सत्ता पर विराजमान अखिलेश यादव की जगह अपने भाई शिवपाल का पक्ष लिया है. सोमवार को एक बार फिर इस दंगल में नया दांव आया. इस बार दांव चला चाचा शिवपाल ने. शिवपाल प्रदेश अध्यक्ष हैं, इसलिए टिकट बाटने का ठेका उनका ही है. भले अखिलेश कई बार कह चुके हो कि चाचा पद कोई ले लो, पर टिकट में ही बाटूंगा. हमेशा की तरह इस बार भी अखिलेश बस कसमसाकर रह गए. उनके विरोध के बावजूद अमरमणि के बेटे अमनमणि को सपा का टिकट मिल गया. अखिलेश इतने बेबस दिखे कि पत्रकारों ने जब अमनमणि के टिकट का पूछा तो वे बोले मैने सारे अधिकार त्याग दिए हैं. एक युवा मुख्यमंत्री की ये मजबूरी कि वे किनारा कर गये. राजनीति हमेशा से घाघ, बेईमान, चालाक, शातिर और मौकापरस्त लोगो के हाथ रही है. खासकर वे लोग इसमें लंबे समय तक बने रहते हैं, जो वक्त के साथ पलटी मारने अपने कहे से कूदने में माहिर हो. दुर्भाग्य, अखिलेश इसमें पूरी तरह अनफिट दिखते हैं. उनमे वो चालाकियां पांच साल सत्ता के बाद भी नहीं आई. उनकी सूरत ही सब कुछ कह जाती है. राजनीति के दोहरे चेहरे वाला मुखोटा अखिलेश अब तक नहीं पहन पाये. 38 साल के इस मुख्यमंत्री ने उत्तरप्रदेश में बहुत बुरा शासन नहीं किया. आज कानून-व्यवस्था के सवाल उठ रहे हैं. निश्चित रूप से ये पक्ष कमजोर है, पर यदि इसकी तुलना समाजवादी पार्टी के पिछले कार्यकाल से ही की जाये तो आज हालात पहले से बेहतर नजर आएंगे। खुद मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते भी उत्तरप्रदेश में कानून-व्यस्था कोई बहुत दुरुस्त नहीं थी. लोगों में खौफ था, सबसे ज्यादा खौफ तो समाजवादी पार्टी के लोगों से ही था. गाड़ियों पर समाजवाद का झंडा गाड़े ये गैंग सबको याद है. आम लोगों की छोड़िये, छोटे इलाकों में अख़बारों के दफ्तर भी इनके डर से शाम ढलते ही बंद हो जाते थे. अखिलेश के शासन में जनता को समाजवाद के झंडे तले मची लूट से बड़ी राहत मिली. बिहार और उत्तरप्रदेश दो ऐसे राज्य हैं जहाँ कोई भी सरकार आ जाये, अगले बीस साल तक सौ फीसदी कानून का राज कोई कायम नहीं कर सकता. अखिलेश के शिक्षा, सेहत और विकास के काम आने वाले सालों में दिखेंगे. पर फ़िलहाल ये मुख्यमंत्री अपनों के हाथ का खिलौना बनता नजर आ रहा है. देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री, सबसे ज्यादा विधानसभा सीटों वाले राज्य का मुखिया इतना हताश, बेबस और मजबूर, क्यों? कोई क्यों पसंद करेगा कमजोर राजा। राजा को मजबूत होने के साथ मजबूत दिखना भी जरुरी है. अखिलेश यहाँ चूक गए हैं. वे लिहाज, सम्मान और डर के साथ पांच साल सरकार चलाते रहे. उत्तरप्रदेश में ये आम धरना है कि यहाँ साढ़े चार मुख्यमंत्री की सरकार है. अखिलेश को आधा मुख्यमंत्री माना जाता है. बाकि चार जिनकी गिनती पूरे मुख्यमंत्री के तौर पर होती है, वो हैं-आज़म खान, मुलायम सिंह, शिवपाल और रामगोपाल। अखिलेश के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि उनके फैसले पलटे गए हो. आज़म खान और शिवपाल यादव ने कभी उन्हें अपना मुख्यमंत्री माना ही नहीं. ताज़ा विवाद मुख़्तार अंसारी के कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय को लेकर हुआ. मुख़्तार जैसे हिस्ट्रीशीटर को सपा में शामिल करने की खिलाफत अखिलेश ने की. चाचा शिवपाल अंसारी को लेकर आये और उन्हें ये विरोध पसंद नहीं आया. चाचा-भतीजे की खुली जंग यहीं से छिड़ी. अखिलेश अपराध और अपराधी मुक्त राजनीति के चेहरे के रूप में उभरे हैं. ऐसे में यदि वे मुख़्तार अंसारी जैसे अपराधी का विरोध नहीं करते तो जनता को क्या चेहरा दिखाते. इसके बाद सीबीआई जांच से घिरे दो मंत्रियों को बर्खास्त कर उन्होंने अपनी ताकत दिखाई. पर ये फैसला भी ज्यादा नहीं टिका, उन्हें ऐसे मंत्रियों को वापस लेना पड़ा. क्या अपराधियों और भृष्ट राजनीति का विरोध करना गुनाह है. खैर, अखिलेश उत्तरप्रदेश और देश दोनों की राजनीती में नई उम्मीद के तौर पर उभरे हैं. उनके जैसे युवा राजनेता की देश को जरुरत है. उन्होंने जातिवादी प्रदेश में वोट की एक नई जाति पैदा की, वो जाति है युवाओं की. अखिलेश अगली बार मुख्यमंत्री बने ये जरुरी नहीं, पर उनके जैसे नई पीढ़ी के युवा का राजनीति में बने रहना जरुरी है. अखिलेश की जो सूरत और सीरत है उससे लगता है कि कही चुनावी खीचतान से तंग आकर वो राजनीति से किनारा ना कर लें. बहुत संभव है कि लगातार हमलों से घबराकर वो खुद को इससे अलग कर लें. ऐसा इसलिए की अखिलेश समाजवादी पार्टी से अलग होकर अपनी नई पार्टी भी नहीं बना सकते, क्योंकि वो मुलायम सिंह के बेटे हैं. मुलायम का नाम अखिलेश की लिए वरदान है तो उतना ही परेशानी भी. वक्त है, अखिलेश अपनी धारा से समझौता न करें और निडर दिखें।

बीजेपी शासित राज्यों को अस्थिर करने में लगे नीतीश

प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बिहार के मुख़्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों बिहार से ज्यादा दूसरे राज्यों में सक्रिय है. बिहार के विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की आंधी को रोकते हुए सरकार बनाने के बाद नीतीश की सक्रियता बढ़ी है. वे नरेंद्र मोदी पर समय समय पर निशाना लगाते रहे हैं. पिछले करीब 9 महीनों से नीतीश एक नई तरह की राजनीति और रणनीति में लगे हैं. नीतीश "चुप रणनीति" में माहिर हैं. वे लोकतंत्र की बात करते हैं, लोकतान्त्रिक दिखते हैं. पर करते वही है जो उनकी पसंद का हो. उनके फैसले तब तक कोई नहीं जान सकता जबकि नीतीश खुद प्रेस कांफ्रेंस में इसका खुलासा न कर दें. उनके मंत्री तक नहीं जानते की कल क्या फैसला होना है. शराब बंदी, जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री चुनना, लालू को गले लगाना, उनके बेटे को उप मुख्यमंत्री बनाने जैसे फैसले ऐसे ही हैं. अब वे बीजेपी की सत्ता वाले राज्यों को सुनियोजित तरीके से अस्थिर करके नरेंद्र मोदी और अमित शाह को झटका देने में लगे हैं. नीतीश की ताज़ा रणनीति बीजेपी शासित राज्यों को अस्थिर करना है. चाणक्य की भूमि पर जन्मे नीतीश शायद वही राजनीती अपना रहे है जिसमे चाणक्य ने कहा था गर्म खिचड़ी खाना है, तो किनारे से बीच तक पहुंचो. यानी किनारे से सत्ता तक पहुँचों. नीतीश ऐसे ही किनारे से प्रधानमंत्री की कुर्सी और बीजेपी शासित राज्यों को घेर रहे हैं. गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, में नीतीश एक तरह से "सर्जिकल स्ट्राइक" को अंजाम दे रहे है. चूँकि नीतीश की पूरी राजनीती मंडल आंदोलन की रही है, इसलिए आसान रास्ता आरक्षण की आग को हवा देना ही है. गुजरात में हार्दिक पटेल का आंदोलन. पटेलों के आरक्षण की मांग को समर्थन और हार्दिक से नीतीश की निकटता इसके प्रमाण हैं. हार्दिक पटेल ने नीतीश कुमार को मंच से अपना नेता माना. नीतीश के करीबी अच्छे से जानते हैं कि इस आंदोलन के बहुत पहले ही नीतीश एक मीटिंग में कह चुके थे कि अभी रुकिए मोदी को अपने ही गुजरात में एक आंदोलन का सामना करना पड़ेगा. इसके बाद बनारस में पटेल मोर्चे की सभा में नीतीश के शामिल होने की चर्चा चलती रही, नीतीश ने न इससे इंकार किया न इकरार. आखिर नीतीश नहीं आये पर उनके खास केसी त्यागी इस मंच पर नीतीश के प्रतिनिधि के तौर पर रहे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश दूसरा उदाहरण है, यहाँ बुधवार को राष्ट्रीय लोकदल नेता अजित सिंह के साथ नीतीश जाट समाज के पक्ष में प्रचार करते दिखे. यहाँ भी मुद्दा वही आरक्षण का रहा. इसमें कहा गया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जाटों को आरक्षण का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हुआ. जाट कम्युनिटी के जरिये नीतीश कई निशाने साध रहे हैं. वे जयपुर में जाट-गुर्जर आंदोलन हवा दे रहे हैं,जाट कम्युनिटी को इसके जरिये सन्देश दे रहे हैं, कि वे उनके साथ हैं. हरियाणा में आरक्षण वाला मामला बीजेपी को प्रभवित करेगा. गुजरात, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, राजस्थान,महाराष्ट्र में आंदोलन और पंजाब में आप को समर्थन नीतीश की रणनीति का हिस्सा है. बीजेपी राज्यों को अस्थिर करने की रणनीति के तहत ही पिछले महीने नीतीश कुमार मध्यप्रदेश भी गए. यहाँ वैसे कोई बड़ा मुद्दा शिवराज सरकार के खिलाफ नहीं है, इस राज्य में जातिवाद और आरक्षण के मुद्दे भी कभी बड़े नहीं रहे यहाँ नीतीश ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख मेधा पाटकर का साथ लिया. बाँध पीड़ितों के बुझे हुए मुद्दे में चिंगारी डाल आये. नीतीश ने पुनर्वास सही न होने का मामला उठाया. साथ ही मध्यप्रदेश में वे शराब बंदी आंदोलन का समर्थन भी कर आये. आने वाले समय में शिवराज सरकार बाँध पीड़ित, शराबबंदी जैसे मुद्दे पर बड़े आंदोलन का सामना कर सकती है. महाराष्ट्र के सतारा में उठा मराठा आरक्षण आंदोलन के पीछे भी कही नीतीश तो नहीं? अभी इसका खुलासा होना बाकि है. एक तरह से नीतीश कुमार संघ की तर्ज़ पर ही जमीनी काम करके बेजीपी सरकारों को अस्थिर करने में लगे हैं. गुजरात में आनंदी बेन को हटाया गया, वहां बीजेपी कमजोर हुई है, आने वाले दिनों में राजस्थान और मध्यप्रदेश भी अस्थिर हो सकते हैं.

बेटे को कुर्सी और भाई को सिर्फ तारीफ़

"घुटना पेट की तरफ ही मुड़ता है " सोमवार को चुपचाप से संकेतों में मुलायम ने ये साबित कर दिया. अखिलेश को सत्ता, और शिवपाल को सिर्फ तारीफ़ दे गए, आखिर वही हुआ जो तय सा था. मीडिया, राजनेता, अखिलेश-शिवपाल समर्थक और तमाम ख़बरों को एक तरफ कर मुलायम ने अपनी ही स्क्रिप्ट पर कहानी को पूरा किया. दो दिन से मीडिया और विश्लेषक तमाम रास्ते गिना रहे थे. पार्टी टूट जायेगी, मुलायम खुद मुख्यमंत्री बनेंगे, अखिलेश को पार्टी से हटा दिया जाएगा. अखिलेश बचेंगे तो अमरसिंह की छुट्टी तय है. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, पहलवान रहे मुलायम ने स्कूल में टीचर की नौकरी भी की है. वे दंगल, शिक्षा और राजनीती तीनों में पारंगत हैं. वे किसी भी दंगल को निपटने में सक्षम हैं. मुलायम ने पूरी ज़िन्दगी कभी किसी से सीधे बैर मोल नहीं लिया. वे "वन्स अपॉन अ टाइम" फिल्म के उस संवाद पर यकीं रखते हैं जिसमे कहा जाता है कि -जब बात से मामला निपट सकता है, तो दूसरे रास्ते क्यों अपनाना. मुलायम की पूरी राजनीती संबंधों को बनाये रखने की रही है. वे तोड़ने में नहीं जोड़ने में यकीं रखते हैं. यदि ऐसा नहीं होता तो यादव कुनबे के इतने लोग आज सत्ता का सुख नहीं भोग रहे होते. उदारता से मुलायम ने अपने परिवार और करीबियों को आगे बढ़ाया है. जबकि दूसरे परिवारों में बेटे और बहू के अलावा भाई, चचेरे भाइयों को कोई नहीं पुछंता. पर मुलायम ने अपने चचेरे भाइयों और उनके बच्चों को भी सब दिया. रामगोपाल यादव इसके उदाहरण हैं. वे चचेरे भाई हैं, पर कभी शिवपाल से कम नहीं आंकें गए. बहुतों को तो पता भी नहीं होगा कि रामगोपाल मुलायम के सगे भाई नहीं है. सोमवार को मुलायम ने मीटिंग में वही किया. उन्होंने अखिलेश को फटकारा, भाई शिवपाल का भी सम्मान बरक़रार रखा. अमरसिंह को दोस्त बताया. पर न अखिलेश को मुख्यमन्त्री पद से हटाने के संकेत दिए, न शिवपाल के अधिकारों में कटौती की बात कही. यानी सिर्फ फटकार और सुलह पर ही मुलायम ने जोर दिया. मुलायम को करीब से जानने वालों को यकीं था कि मुलायम कोई कड़ा फैसला नहीं लेंगे. वे सुलह में यकीं रखते हैं, और उन्होंने वही किया. भाई शिवपाल की खूब तारीफ की, उन्हें पार्टी के लिए खून पसीना, बहाने वाला बताया. अखिलेश को बोले तुमको क्या पता है, पार्टी कैसे चलती है. पर शिवपाल के हाथ सिर्फ तारीफ और अमरसिंह और मुख़्तार अंसारी ही आये. सत्ता और उसका भविष्य तो वे बेटे अखिलेश को ही दे गए. उन्होंने पूरे समाजवादी कुनबे को बता दिया की अखिलेश ही मुख्यमंत्री हैं, और रहेंगे, साफ़ इशारा है कि सारे नेता कार्यकर्ता किसी मुगालते में न रहें. यही मुलायम का महीन अंदाज़ है.