Wednesday, November 30, 2016

अब मिलेगा मोदी को नोटबंदी का असली "मेहनताना"

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एप के जरिये भले 90 फीसदी समर्थन हासिल कर लिया हो, पर असली फैसला अब आयेगा. देश का एक बड़ा तबका और बाज़ार दोनों का सामना अब मोदी सरकार को करना पड़ेगा. ये वो वर्ग है, जो देश की रीढ़ है, ये अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और सरकार के शास्त्र को चलाता है. बीजेपी भी इसे अपना वोट बैंक मानती है. ये है भारत का वेतनभोगी तबका. एक तारीख से वेतन बटना है. बैंकिंग से जुड़े लोगों की मानें तो बैंकों के पास अभी एक फीसदी भी कैश पूरी तरह नहीं है. ऐसे में वेतन बटना, बेहद मुश्किल होगा. अकाउंट में पैसा भले ट्रांसफर हो जायेगा, पर एटीएम से यदि मिलेगा नहीं तो जाहिर है बड़ा गुस्सा फूटेगा. सरकार के लिए बड़ी चुनोती होगा इसे काबू करना. देश की आबादी का लगभग 80 फीसदी हिस्सा वेतन पर ही निर्भर है. भले वो सरकारी कर्मचारी हो निजी उपक्रम में नौकरी करता हो, या किसी व्यापारी के यहाँ. अभी तक सरकार की खासकर मोदी की हठधर्मिता, संघ और बीजेपी के प्रचार तंत्र ने लोगों को बोलने का मौका ही नहीं दिया. जिसने भी कुछ कहने कि कोशिश की उसे देशद्रोही, कालाधनवाला का तमगा देकर एक किनारे कर दिया. देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत के अर्थशास्त्र को जमीनी तौर पर समझने वाले मनमोहनसिंह ने फैसले की कुछ कमियों \पर सवाल उठाये तो उनके सवालों के जवाब भी सरकार ने नहीं दिए. उलटे वि त्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जिनका खुद का राज कालेधन और घोटाले से भरा रहा, वो हम पर सवाल ना उठायें. जेटली और बीजेपी दोनों को समझना चाहिये कि कांग्रेस तो अपने घोटाले की सजा भुगत रही है, पर आज सत्ता में होने के नाते हर सवाल का जवाब सरकार को देना ही चाहिये. जवाब ना देना आपको सही साबित नहीं करता, जवाब न देने से फौरी तौर पर सरकार खुश हो सकती है. पर वो सवाल बने रहते हैं, वो जनता के बीच घूमते रहते हैं, और सवालों की ये यात्रा अच्छे-अच्छों का सत्ता रथ रोक चुकी है. बेहतर होता सरकार उचित तथ्यों के साथ जवाब देती और अपने पक्ष को मजबूत करती. सरकार के रुख में कोई बदलाव नहीं दिख रहा. न सदन में न सदन के बाहर कहीं भी सकारात्मक बहस नहीं दिख रही. खैर, अब मूल मुद्दे पर आते हैं. वेतनभोगियों के गुस्से से निपटना आसान नहीं होगा. अब तक सबसे ज्यादा परेशानी गरीब तबके या रोज खाने कमाने वाले वर्ग ने झेली है. ये वो वर्ग है जो राजनीतिक रूप से भी परिपक्व नहीं है, और जिसकी आवाज़ कोई आवाज़ नहीं बन पा ती. ये संगठित भी नहीं हैं. ख़ास बात इस वर्ग का एटीएम व बैंकिंग से कोई लेनदेन नहीं है. . लेकिन वेतनभोगियों के साथ ऐसा नहीं है. ये संगठित हैं, इनकी आवाज़ गूंज बन जाती है. ये पूरी तरह बैंकिंग से जुड़ा हुआ और एटीएम पर निर्भर वर्ग है. ख़ास या चिंता की बात ये है कि वेतनभोगी बैंकिंग से जुड़े हैं पर इनका कार्ड से खरीदी और ऑनलाइन बैंकिंग पर भरोसा नहीं है. ये कैश में उधारी में भरोसा करता है. वेतनभोगी का 90 फीसदी वर्ग मध्यम वर्ग का है. हर वेतनभोगी के साथ औसत चार लोगों की जिम्मेदारी जुडी है. इसकी परेशानी अकेले की नहीं होगी हर वेतन भोगी के साथ एक परिवार परेशान होगा. यानी अब समूह में गुस्से का सामना सरकार का करना होगा. सबसे बड़ा सामना गृहिणियों के गुस्से का करना होगा. वेतनभोगी आमतौर पर २५ तारीख से ही अगली तनख्वाह का इंतज़ार करने लगता है. उसकी दुनिया एक तारीख को मिलने वाले वेतन से दस तारीख तक ख़तम हो जाती है. फिर आगे के 15 दिन यानी 25 तारीख तक का वक्त वो सुकून से गुजारता है, फिर आगे के 5 दिन अगली तनख्वाह के इंतज़ार में. बड़ी संख्या में ये लोग महीने भर का सामान एक साथ खरीद लेते हैं. अधिकतर लोग अपनी जरुरत का सामान मोहल्ले की किराना दूकान से नगद ही खरीदते हैं. गाड़ी की किस्तें, घर का किराया, बच्चों की फीस, अपने यहाँ काम करने वालों का पैसा सबकुछ नगद ही होता है. अब बैंकों में पैसा है नहीं, एटीएम पर कतार हैं. वेतनभोगियों के बाजार में उतरने के बाद ये कतारें लंबी होगी. एटीएम और बैंकों की कतार में खड़ा हर वेतनभोगी और एटीएम से निकली सिमित पैसों की पर्ची सरकार को भारी पड़ सकती है. हर पर्ची के साथ गुस्सा और 3 वोट कम होने की आशंका है. क्योंकि वेतनभोगियों के साथ एक चैन जुडी है, परिवार, किराना दुंकानवाले, उनके यहां काम करने वाले. ये सब जब एक साथ गुस्सा होंगे तो गुस्से का गुबार कितना बड़ा होगा ये समझना ही होगा. अब सवाल ये हैं कि नोटबंदी के 25 दिनों में ये वर्ग गुस्सा क्यों नहीं हुआ. सीधी सी बात है वेतनभोगी पूरे महीने का बजट लेकर चलता है. नोटबंदी की घोषणा हुई 9 तारीख को तबतक वेतनभोगी अपने घर का महीने भर का जरुरी सामान और जरुरी काम निपटा चुका था. उसे पूरा महीना कोई बड़ी दिक्कत नहीं आई. उसे उम्मीद थी कि अगली तनख्वाह तक सब ठीक हो जायेगा पर ऐसा हुआ नहीं, न होता दिख रहा. मोदी सरकार सतर्क हो जाए इतिहास गवाह है कि वेतनभोगी का एक बड़ा वर्ग ईमानदार कौम है और जब ईमानदार को दूसरे की बेईमानी का दर्द जबरिया झेलना पड़ता है वो पूरा बदला लेता है. कई सरकारें इस वर्ग ने उलट दी है. मोदी सरकार की नोट बंदी का असली "मेहनताना" अब मिलेगा. देखना हैं सरकार इनाम पाती है या ------!

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