Friday, November 4, 2016
एक बेचारा मुख्यमंत्री ! अखिलेश के लिए मुलायम का नाम वरदान से ज्यादा आज परेशानी बन गया
उत्तरप्रदेश की चुनावी महाभारत इस समय यदुवंश की लड़ाई पर सिमटी है. सत्ता के मजबूत स्तम्भ इस यदुवंश या यादव परिवार में कलह मचा हुआ है. कुनबे के मुखिया मुलायम को जनता धृतराष्ट्र और धर्मराज युधिष्ठिर दोनों के रूप में देख रही है. कुछ उन्हें धृतराष्ट तो कुछ युधिष्ठिर मान रहे हैं. खुद मुलायम ने अभी तक पुत्र मोह से खुद को अलग दिखाया है. मुलायम ने पुत्र और सत्ता पर विराजमान अखिलेश यादव की जगह अपने भाई शिवपाल का पक्ष लिया है. सोमवार को एक बार फिर इस दंगल में नया दांव आया. इस बार दांव चला चाचा शिवपाल ने. शिवपाल प्रदेश अध्यक्ष हैं, इसलिए टिकट बाटने का ठेका उनका ही है. भले अखिलेश कई बार कह चुके हो कि चाचा पद कोई ले लो, पर टिकट में ही बाटूंगा. हमेशा की तरह इस बार भी अखिलेश बस कसमसाकर रह गए. उनके विरोध के बावजूद अमरमणि के बेटे अमनमणि को सपा का टिकट मिल गया. अखिलेश इतने बेबस दिखे कि पत्रकारों ने जब अमनमणि के टिकट का पूछा तो वे बोले मैने सारे अधिकार त्याग दिए हैं. एक युवा मुख्यमंत्री की ये मजबूरी कि वे किनारा कर गये.
राजनीति हमेशा से घाघ, बेईमान, चालाक, शातिर और मौकापरस्त लोगो के हाथ रही है. खासकर वे लोग इसमें लंबे समय तक बने रहते हैं, जो वक्त के साथ पलटी मारने अपने कहे से कूदने में माहिर हो. दुर्भाग्य, अखिलेश इसमें पूरी तरह अनफिट दिखते हैं. उनमे वो चालाकियां पांच साल सत्ता के बाद भी नहीं आई. उनकी सूरत ही सब कुछ कह जाती है. राजनीति के दोहरे चेहरे वाला मुखोटा अखिलेश अब तक नहीं पहन पाये. 38 साल के इस मुख्यमंत्री ने उत्तरप्रदेश में बहुत बुरा शासन नहीं किया. आज कानून-व्यवस्था के सवाल उठ रहे हैं. निश्चित रूप से ये पक्ष कमजोर है, पर यदि इसकी तुलना समाजवादी पार्टी के पिछले कार्यकाल से ही की जाये तो आज हालात पहले से बेहतर नजर आएंगे। खुद मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री रहते भी उत्तरप्रदेश में कानून-व्यस्था कोई बहुत दुरुस्त नहीं थी. लोगों में खौफ था, सबसे ज्यादा खौफ तो समाजवादी पार्टी के लोगों से ही था. गाड़ियों पर समाजवाद का झंडा गाड़े ये गैंग सबको याद है. आम लोगों की छोड़िये, छोटे इलाकों में अख़बारों के दफ्तर भी इनके डर से शाम ढलते ही बंद हो जाते थे. अखिलेश के शासन में जनता को समाजवाद के झंडे तले मची लूट से बड़ी राहत मिली. बिहार और उत्तरप्रदेश दो ऐसे राज्य हैं जहाँ कोई भी सरकार आ जाये, अगले बीस साल तक सौ फीसदी कानून का राज कोई कायम नहीं कर सकता. अखिलेश के शिक्षा, सेहत और विकास के काम आने वाले सालों में दिखेंगे. पर फ़िलहाल ये मुख्यमंत्री अपनों के हाथ का खिलौना बनता नजर आ रहा है.
देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री, सबसे ज्यादा विधानसभा सीटों वाले राज्य का मुखिया इतना हताश, बेबस और मजबूर, क्यों? कोई क्यों पसंद करेगा कमजोर राजा। राजा को मजबूत होने के साथ मजबूत दिखना भी जरुरी है. अखिलेश यहाँ चूक गए हैं. वे लिहाज, सम्मान और डर के साथ पांच साल सरकार चलाते रहे. उत्तरप्रदेश में ये आम धरना है कि यहाँ साढ़े चार मुख्यमंत्री की सरकार है. अखिलेश को आधा मुख्यमंत्री माना जाता है. बाकि चार जिनकी गिनती पूरे मुख्यमंत्री के तौर पर होती है, वो हैं-आज़म खान, मुलायम सिंह, शिवपाल और रामगोपाल। अखिलेश के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि उनके फैसले पलटे गए हो. आज़म खान और शिवपाल यादव ने कभी उन्हें अपना मुख्यमंत्री माना ही नहीं. ताज़ा विवाद मुख़्तार अंसारी के कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय को लेकर हुआ. मुख़्तार जैसे हिस्ट्रीशीटर को सपा में शामिल करने की खिलाफत अखिलेश ने की. चाचा शिवपाल अंसारी को लेकर आये और उन्हें ये विरोध पसंद नहीं आया. चाचा-भतीजे की खुली जंग यहीं से छिड़ी. अखिलेश अपराध और अपराधी मुक्त राजनीति के चेहरे के रूप में उभरे हैं. ऐसे में यदि वे मुख़्तार अंसारी जैसे अपराधी का विरोध नहीं करते तो जनता को क्या चेहरा दिखाते. इसके बाद सीबीआई जांच से घिरे दो मंत्रियों को बर्खास्त कर उन्होंने अपनी ताकत दिखाई. पर ये फैसला भी ज्यादा नहीं टिका, उन्हें ऐसे मंत्रियों को वापस लेना पड़ा. क्या अपराधियों और भृष्ट राजनीति का विरोध करना गुनाह है.
खैर, अखिलेश उत्तरप्रदेश और देश दोनों की राजनीती में नई उम्मीद के तौर पर उभरे हैं. उनके जैसे युवा राजनेता की देश को जरुरत है. उन्होंने जातिवादी प्रदेश में वोट की एक नई जाति पैदा की, वो जाति है युवाओं की. अखिलेश अगली बार मुख्यमंत्री बने ये जरुरी नहीं, पर उनके जैसे नई पीढ़ी के युवा का राजनीति में बने रहना जरुरी है. अखिलेश की जो सूरत और सीरत है उससे लगता है कि कही चुनावी खीचतान से तंग आकर वो राजनीति से किनारा ना कर लें. बहुत संभव है कि लगातार हमलों से घबराकर वो खुद को इससे अलग कर लें. ऐसा इसलिए की अखिलेश समाजवादी पार्टी से अलग होकर अपनी नई पार्टी भी नहीं बना सकते, क्योंकि वो मुलायम सिंह के बेटे हैं. मुलायम का नाम अखिलेश की लिए वरदान है तो उतना ही परेशानी भी. वक्त है, अखिलेश अपनी धारा से समझौता न करें और निडर दिखें।
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