Friday, November 4, 2016
बीजेपी शासित राज्यों को अस्थिर करने में लगे नीतीश
प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बिहार के मुख़्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों बिहार से ज्यादा दूसरे राज्यों में सक्रिय है. बिहार के विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की आंधी को रोकते हुए सरकार बनाने के बाद नीतीश की सक्रियता बढ़ी है. वे नरेंद्र मोदी पर समय समय पर निशाना लगाते रहे हैं. पिछले करीब 9 महीनों से नीतीश एक नई तरह की राजनीति और रणनीति में लगे हैं. नीतीश "चुप रणनीति" में माहिर हैं. वे लोकतंत्र की बात करते हैं, लोकतान्त्रिक दिखते हैं. पर करते वही है जो उनकी पसंद का हो. उनके फैसले तब तक कोई नहीं जान सकता जबकि नीतीश खुद प्रेस कांफ्रेंस में इसका खुलासा न कर दें. उनके मंत्री तक नहीं जानते की कल क्या फैसला होना है. शराब बंदी, जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री चुनना, लालू को गले लगाना, उनके बेटे को उप मुख्यमंत्री बनाने जैसे फैसले ऐसे ही हैं. अब वे बीजेपी की सत्ता वाले राज्यों को सुनियोजित तरीके से अस्थिर करके नरेंद्र मोदी और अमित शाह को झटका देने में लगे हैं.
नीतीश की ताज़ा रणनीति बीजेपी शासित राज्यों को अस्थिर करना है. चाणक्य की भूमि पर जन्मे नीतीश शायद वही राजनीती अपना रहे है जिसमे चाणक्य ने कहा था गर्म खिचड़ी खाना है, तो किनारे से बीच तक पहुंचो. यानी किनारे से सत्ता तक पहुँचों. नीतीश ऐसे ही किनारे से प्रधानमंत्री की कुर्सी और बीजेपी शासित राज्यों को घेर रहे हैं. गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, में नीतीश एक तरह से "सर्जिकल स्ट्राइक" को अंजाम दे रहे है. चूँकि नीतीश की पूरी राजनीती मंडल आंदोलन की रही है, इसलिए आसान रास्ता आरक्षण की आग को हवा देना ही है. गुजरात में हार्दिक पटेल का आंदोलन. पटेलों के आरक्षण की मांग को समर्थन और हार्दिक से नीतीश की निकटता इसके प्रमाण हैं. हार्दिक पटेल ने नीतीश कुमार को मंच से अपना नेता माना. नीतीश के करीबी अच्छे से जानते हैं कि इस आंदोलन के बहुत पहले ही नीतीश एक मीटिंग में कह चुके थे कि अभी रुकिए मोदी को अपने ही गुजरात में एक आंदोलन का सामना करना पड़ेगा. इसके बाद बनारस में पटेल मोर्चे की सभा में नीतीश के शामिल होने की चर्चा चलती रही, नीतीश ने न इससे इंकार किया न इकरार. आखिर नीतीश नहीं आये पर उनके खास केसी त्यागी इस मंच पर नीतीश के प्रतिनिधि के तौर पर रहे. पश्चिमी उत्तर प्रदेश दूसरा उदाहरण है, यहाँ बुधवार को राष्ट्रीय लोकदल नेता अजित सिंह के साथ नीतीश जाट समाज के पक्ष में प्रचार करते दिखे. यहाँ भी मुद्दा वही आरक्षण का रहा. इसमें कहा गया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने जाटों को आरक्षण का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हुआ. जाट कम्युनिटी के जरिये नीतीश कई निशाने साध रहे हैं. वे जयपुर में जाट-गुर्जर आंदोलन हवा दे रहे हैं,जाट कम्युनिटी को इसके जरिये सन्देश दे रहे हैं, कि वे उनके साथ हैं. हरियाणा में आरक्षण वाला मामला बीजेपी को प्रभवित करेगा. गुजरात, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, राजस्थान,महाराष्ट्र में आंदोलन और पंजाब में आप को समर्थन नीतीश की रणनीति का हिस्सा है.
बीजेपी राज्यों को अस्थिर करने की रणनीति के तहत ही पिछले महीने नीतीश कुमार मध्यप्रदेश भी गए. यहाँ वैसे कोई बड़ा मुद्दा शिवराज सरकार के खिलाफ नहीं है, इस राज्य में जातिवाद और आरक्षण के मुद्दे भी कभी बड़े नहीं रहे यहाँ नीतीश ने नर्मदा बचाओ आंदोलन की प्रमुख मेधा पाटकर का साथ लिया. बाँध पीड़ितों के बुझे हुए मुद्दे में चिंगारी डाल आये. नीतीश ने पुनर्वास सही न होने का मामला उठाया. साथ ही मध्यप्रदेश में वे शराब बंदी आंदोलन का समर्थन भी कर आये. आने वाले समय में शिवराज सरकार बाँध पीड़ित, शराबबंदी जैसे मुद्दे पर बड़े आंदोलन का सामना कर सकती है. महाराष्ट्र के सतारा में उठा मराठा आरक्षण आंदोलन के पीछे भी कही नीतीश तो नहीं? अभी इसका खुलासा होना बाकि है. एक तरह से नीतीश कुमार संघ की तर्ज़ पर ही जमीनी काम करके बेजीपी सरकारों को अस्थिर करने में लगे हैं. गुजरात में आनंदी बेन को हटाया गया, वहां बीजेपी कमजोर हुई है, आने वाले दिनों में राजस्थान और मध्यप्रदेश भी अस्थिर हो सकते हैं.
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