Thursday, November 24, 2016

अपने सर्वे में सर्वेसर्वा ! ॐ नमो,, नमो !

<प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार संसद से दूर हैं. पर जनता के सामने भावना से भरे प्रधानमंत्री रोज अवतरित हो रहे हैं. आखिर सारी दुनिया को सीना ठोककर,ताली बजाकर, मुट्ठी भींचकर जवाब देने वाले "जननेता" को संसद में बोलने से परहेज क्यों? जनता ने उन्हें संसद और बहुमत ने उन्हें देश की जिम्मेदारी दी है. तो संसंद में ख़ामोशी उसी बहुमत को ठेंगा दिखाना और अपने हठधर्मिता ही कही जायेगी ( हालांकि मोदी समर्थक इस हठधर्मिता को उनके व्यवहार की सबसे बड़ी खूबी मानते हैं). नोटबंदी के मुद्दे पर तो मोदी हठ के बजाय "हट धर्मिता" यानी जो भी सवाल करेगा उसे हट... हट कर रहे हैं. ताज़ा मज़ाक उन्होंने जनता के साथ किया. कुल जमा एक दिन में मोदी ने एक सर्वे नोटबंदी पर करवाया और खुद को जनता का दुलारा घोषित कर लिया. उन्होंने घोषित कर दिया की 90 प्रतिशत से ज्यादा जनता नोटबंदी के फैसले से खुश है. यानी हर तरफ नमो.. नमो के नारे और जय जय कार है. जनता के साथ इतना बड़ा मज़ाक पहले किसी प्रधानमंत्री ने नहीं किया, जनता का दर्द एक तरफ मोबाइल एप पर खरीदी वाह वाही एक तरफ. आखिर इस सर्वे के जरिये प्रधानमंत्री क्या साबित करना चाहते हैं. वे विपक्ष को चिढा रहे हैं, या संसद और सांसदों को ठेंगा दिखाकर अपनी अलग संसद के बाहर बहुमत की जोर आजमाइश दिखा रहे हैं. आपके पास बहुमत हैं, जनता ने आप पर भरोसा किया. फिर ये सब ठिठोली और दो हजार के नोट जैसा प्रदर्शन क्यों ? आखिर उस सर्वे से क्या हल निकलेगा, देश का दर्द कम होगा, नॉट की अफरातफरी रुकेगी या संसद में विपक्ष चुप हो जायेगा. देश अब मोदी से जवाब मांग रहा है. देश उनकी लोकप्रियता का नहीं उनके फैसलों पर सवाल उठा रहा है. निश्चित ही आपकी प्रचार, प्रसार क्षमता कइयों से ज्यादा है, आप उसका भरपूर लाभ भी उठा रहे हैं. उसका एक कारण इस देश की राजनीती में कोई दूसरा नेता ना होना है. हमारा दुर्भाग्य है कि चुनने के लिए जो विकल्प हैं वो भी "पप्पू" सरीखे हैं. इसलिए ये मत समझये की आप निर्विवाद रूप से नेता है. आप वक्त की मजबूरी के भी नेता हैं. आपके आंसू, आपकी कड़क चाय, आपकी माताजी का लाइन में लगकर नोट बदलवाना सब देश ने देखा. समझा. पर देश की सवा अरब जनता चाहती हैं, आप नहीं रोयें बल्कि जनता की आंसू पोंछने देश के तमाम माताओं के लाइन में लगने और धूपः में गिर जाने, इलाज के लिए भटकने का हल बताएं. आपकी देशभक्ति देश ने खूब सराही पर उसके नाम पर आप जनता को दर्द नहीं दे सकते. एक बीमारी मिटाने के नाम पर आप जनता को दवा की जगह जहर नहीं दे सकते. आखिर सवा अरब की आबादी में पांच लाख लोगों ने प्रधानमंत्री के सर्वे में भाग लिया. 90 फीसदी ने फैसले को सराहा. अछि बात है. पर ये लोग हैं कौन सीधे सीधे मोदी के एप से सिर्फ बीजेपी या मोदी भक्त ही जुड़े हैं. जाहिर है वे जवाब क्या देंगे. ये जनता के नहीं मोदीजी के भक्तों के जवाब हैं. ये पेड न्यूज़ जैसा ही कुछ है. इतने प्रशंषकों में भी करीब दस फीसदी यानी ४०००० लोगों ने इस फैसले के खिलाफ वोट दिया. यानी ये भी खतरा हैं, अपने ही लोगों से इसे भी समझिये. आखिर कोई क्या जवाब देते ऐसे सवालों के - क्या आतंकवाद से लड़ना चाहिए ? क्या कालाधन ख़त्म होना चाहिए ? क्या टैक्स चोरी पर करवाई नहीं होना चाहिए ? अब बताएं इसका क्या जवाब देगा कोई भी.? आप किसी से पूछो कि आपकी माँ बुरी औरत है ? क्या वो डायन है ? आदमी क्या जवाब देगा। ऐसे पाले पोसे सर्वे का सार यही है जो पहले से तय था अपना सर्वे अपने लोग अपन ही सर्वेसर्वा ! मोदी की जय, जय, नमो की जय जय पर किसी भी प्रधानमंत्री को ऐसा सर्वे करना शोभा देता है ? क्यों नहीं कांग्रेस इस पर एक सर्वे करवाती !

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