Friday, November 4, 2016
नीतीश की कथनी-करनी अलग, फिर बीजेपी से जुड़ेंगे !
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक सच्चे नेता की छवि बनाये हुए हैं, पर हकीकत में वो पलटीबाज़ और मौकापरस्त हैं. ताज़ा मामला सुप्रीम कोर्ट का है. अदालत ने हिस्ट्रीशीटर, बाहुबली शहाबुद्दीन को जमानत मिलने पर नीतीश सरकार को फटकारा है. कोर्ट ने पूछा बाहुबली को जमानत मिलने तक आप नींद में थे. जाहिर है,जमानत की कार्रवाई चलने तक नीतीश सरकार चुप बैठी रही. जब जमानत मिल गई, तब नीतीश जागे। अब नीतीश कह रहे हैं, जमानत के खिलाफ उपरी अदालत में जायेंगे. ऐसा पहली बार नहीं है, जब नीतीश ने कहा कुछ, किया कुछ. नीतीश कुमार ऐसे नेता हैं, जिन्हें किसी पर भरोसा नहीं. वे सारी सियासत खुद चलाते हैं. उनके मंत्री, अफसर सिर्फ शोभा की सुपारी हैं. ऐसे, में शहाबुद्दीन की जमानत तक नीतीश को प्रक्रिया की खबर न हो संभव नहीं. बिहार में इतने घोटाले और मामले चलते रहे हैं, कि यहाँ के राजनेताओं को राजनीती से ज्यादा क़ानून की समझ होती है. आखिर लालू के ख़ास शहाबुद्दीन को जमानत मिलना क्या दर्शाता है. निश्चित तौर पर ये अदालत का फैसला है, नीतीश इसमें क्या करते? जनता दल, नीतीश ऐसा ही कहेंगे, पर सरकार ने जमानत न मिले इसके लिए क्या किया. क्या नीतीश वो दस्तावेज सार्वजनिक करेंगे? अब जवाब वही होगा सुशासन हमारी पहचान है, कोई बर्दाश्त नहीं. हमने ही शहाबुद्दीन को जेल भेजा था. पर अब ये तर्क गले नहीं उतरता क्योंकि अब नीतीश लालू के समर्थन वाली सरकार चला रहे है. राजनीती में समर्थन दो तरफ़ा ही होता है.
ये पहला और आखिरी मामला नहीं है. नीतीश ने अयोध्या मामले के बाद बीजेपी की सरकार में मंत्री पद स्वीकारा। गोधरा के बाद भी मंत्री बने रहे. लालू की खिलाफत कर सत्ता की सवारी की. लालू के जंगलराज को कोसते रहे. लालू के साथ दुरी, नफरत की हद तक प्रचारित करते रहे. फिर उसी लालू के साथ सत्ता में हैं. आज लालू को बड़ा भाई बताने से नहीं थकते. नरेन्द्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते बिहार बाढ़ राहत कोष में भेजे रुपये लौटाए, मोदी के साथ दुरी दिखाने के लिए पटना में भोज रद्द किया. मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने की बात पर बीजीपी से नाता तोडा. अब लगातार मोदी के करीब दिख रहे हैं. मोदी के साथ नाम जोड़ने पर भी खफा होने वाले नीतीश उनकी कमेटी में शामिल हो गए. बीजेपी से कोई नाता नहीं रखने का राग अलापने वाले नीतीश आज दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी समारोह के लिए बनी समिति का हिस्सा बन गए हैं. ख़ास बात यह है कि इस समिति में कांग्रेस का कोई नेता नहीं है. तो क्या नीतीश फिर बीजेपी के साथ जायेंगे.?
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