Tuesday, January 17, 2017

शिवपाल यादव का हश्र, चेतावनी है तानाशाही की राजनीति करने वाले नेताओं को !

कल तक "पार्टी" मांग रहे चाचा शिवपाल आज अपने खुद के टिकट के लायक भी नहीं रहे क्यों ? कहावत है कि किस्मत कब बदल जाये कहा नहीं जा सकता. राजनीति में तो कई बार कुछ घंटों में ही बाज़ी पलट जाती है. राजा रंक और रंक राजा बन जाता है. उत्तरप्रदेश में कल तक समाजवादी पार्टी के मुखिया रहे चाचा शिवपाल से ज्यादा इसे कौन समझ सकेगा. दो दिन पहले तक पूरी समाजवादी पार्टी पर अपना दावा जताने वाले शिवपाल आज अपने खुद के टिकट के लिए अखिलेश के भरोसे हैं. पिछले सप्ताह तक समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रमुख बनकर पूरी 403 सीटों पर अपनी मर्जी से टिकट बांटने का अधिकार और जिद रखने वाले शिवपाल आज नितांत अकेले हैं. राजनीति में वैसे भी कोई कभी किसी का सगा नहीं। समाजवादी पार्टी में तो बेटा अपने पिता का ना हुआ. पिता से टक्कर लेने वाला चाचा को कैसे बक्श देगा? शिवपाल ने टिकट के लिए अपनी सूचि भी जारी कर दी थी और इसी सूची ने उन्हें समाजवादी पार्टी की सूची से ही बाहर कर दिया. सत्ता के साथी होते हैं, कार्यकर्त्ता, नेता और मंत्री। यदि पार्टी की लड़ाई मुलायम जीत जाते तो आज शिवपाल के घर हजारों लोगों का हुजूम होता. पर आज सबकुछ अखिलेश के पाले में हैं. वक्त रहते राजनीति की करवट को न समझना, बदलाव की इबारत को न पढ़ पाना, अपने पुराने दौर की ज़िद, घमंड और "मैं" की गुंडई शिवपाल को भारी पड़ी. ये भी सिद्ध हो गया कि शिवपाल की अपनी कोई राजनीतिक समझ नहीं है. वे सिर्फ मुलायम सिंह यादव के आशीर्वाद और यादव कुनबे के होने के सत्ता और संगठन सुख लेते रहे. आखिर क्यों चूक गए शिवपाल जैसे चालाक राजनेता. सीधा कारण है, जनता और कार्यकर्त्ता अब धमकाने वाले, रंगदार जैसा व्यवहार करने वाले नेता को पसंद नहीं करती. जनता ही नहीं कार्यकर्त्ता भी अब बराबरी का हक़, साथ खड़े होने का सम्मान चाहता है, वो किसी के चरणों में धमक के कारण झुकने को तैयार नहीं है. अखिलेश ने उत्तरप्रदेश खासकर समाजवादी पार्टी की राजनीति में बड़ा बदलाव पैदा किया है. उन्होंने अपनी सूरत की तरह ही अपनी सीरत से भी लोगों में ये भरोसा पैदा किया कि यादव कुनबे का ये सपूत थोड़ा अलग है. समाजवादी पार्टी की लड़ाई, कुनबे का संघर्ष चाहे जो परिणाम दे चुनाव में, पर एक बात तय है देश में युवा शक्ति, युवा राजनीति और लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है. न कोई पार्टी किसी की खानदानी विरासत हो सकती है, न कोई कार्यकर्त्ता और जनता का अपमान करके लंबी पारी खेल सकता है. अब सम्मान और विकास की राजनीति का ही दौर है. गुमान, जिद, तानाशाही अब बीते दिनों की बात हुई.

No comments:

Post a Comment